“पक्ष-विपक्ष से मुक्त लोकतंत्र ही वास्तविक लोकतंत्र”
मैं वर्तमान लोकतंत्र को विकृत लोकतंत्र मानता हूँ, क्योंकि इसमें पक्ष और विपक्ष नामक दो गुट बनने अनिवार्य माने जाते हैं। मैं इस तरह की गुटबंदी से सहमत नहीं हूँ। फिर भी जो वर्तमान लोकतंत्र है, इसमें पक्ष और विपक्ष का होना अनिवार्य माना गया है। इस स्थिति में यह बात अवश्य उठती है कि आम जनता विपक्ष का समाप्त होना उचित नहीं समझती। जब भी भारत में विपक्ष के समाप्त होने की चर्चाएँ शुरू होती हैं, तो तुरंत ही सत्तारूढ़ जनमत में से एक नया तीसरा पक्ष खड़ा होना शुरू हो जाता है। ऐसा ही 3 वर्ष पहले भी हुआ और ऐसा ही अभी फिर होता दिख रहा है, क्योंकि बिहार में प्रशांत किशोर का उदय और तमिलनाडु में एक अनजान विजय का उदय, साथ में जैन जी और यूजीसी के नाम से अलग-अलग विरोध, यह बात सिद्ध करते हैं कि भारत की जनता विपक्ष-मुक्त राजनीति के पक्ष में नहीं है।
यह बात मैं पहले भी कई बार लिख चुका हूँ, लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगता था कि ऐसा समय अब आ गया है। यद्यपि मैं इसको विकृत लोकतंत्र मानता हूँ, अच्छा लोकतंत्र नहीं। अच्छा लोकतंत्र तो वही होना चाहिए, जिसमें न कोई पक्ष हो, न कोई विपक्ष हो, बल्कि प्रत्येक सांसद निष्पक्ष हो और प्रत्येक सांसद स्वतंत्र हो।
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