वर्ण व्यवस्था और कुंभ प्रणाली का नए स्वरूप में पुनर्गठन

23 अगस्त प्रातः कालीन सत्र। हम हिंदू संस्कृति के लोग हैं। हम वर्ण व्यवस्था को भी मानते हैं और कुंभ प्रणाली को भी अच्छा मानते हैं। दुनिया की यह सबसे अच्छी प्रणाली है। इसके अनुसार हम मानते हैं कि मार्गदर्शक अर्थात ब्राह्मण, रक्षक अर्थात क्षत्रिय, पालक अर्थात वैश्य और सेवक अर्थात शूद्र—चारों का आपस में तालमेल भी होना चाहिए और चारों की अपनी-अपनी स्वतंत्रता भी होनी चाहिए। संतुलन और स्वतंत्रता को ही हम स्वतंत्रता और सहजीवन का तालमेल मानते हैं।

स्पष्ट है कि एक विचारकों का ग्रुप अवश्य होना चाहिए, जिसे हम मार्गदर्शक कहते हैं। देश-काल-परिस्थिति के अनुसार नीतियाँ बदलनी पड़ती हैं। कभी-कभी सिद्धांतों में भी समझौते करने पड़ते हैं। नीतियाँ तो यह मार्गदर्शक मिलकर और राज्य के साथ संतुलन बनाकर बदल सकते हैं, किंतु सिद्धांतों में यदि कोई बदलाव लाना है, इसके लिए हमने 12 वर्ष में एक बार कुंभ की भी प्रणाली बनाई थी। कुंभ में सभी वर्णों के लोग एकत्रित होते थे और अपनी-अपनी योग्यता के अनुसार वहाँ निष्कर्ष निकालकर घर लौटते थे।

इस तरह हमने व्यक्ति से समाज व्यवस्था और स्वतंत्रता से सहजीवन के तालमेल का जो ढाँचा बनाया था, वह विकृत हुआ। कुंभ की भी धारणा बदली, वर्ण व्यवस्था भी रूढ़ हो गई और दुष्ट राजनीतिक प्रवृत्तियाँ हमारी इस समय की कमजोरी का लाभ उठाकर मजबूत हो रही हैं।

ऐसी स्थिति में हमें नए सिरे से वर्ण व्यवस्था और कुंभ व्यवस्था का संशोधीकरण करना चाहिए। हम पुराने तरीके पर वर्ण व्यवस्था और कुंभ को दूर तक नहीं ले जा सकेंगे। इसलिए हम लोगों ने वर्तमान वर्ण व्यवस्था और कुंभ व्यवस्था में बहुत थोड़ा-सा संशोधन करते हुए उसको नया स्वरूप देने का प्रयास किया है। हम वर्ण व्यवस्था को मार्गदर्शक, रक्षक, पालक और सेवक—इन चार भागों में बाँट रहे हैं और कुंभ में एक मार्गदर्शक सम्मेलन भी रखने पर विचार किया जाएगा।