बंगाल चुनाव के बाद बदला सामाजिक माहौल
बंगाल चुनाव के नतीजे के बाद यह बात साफ दिखने लगी थी कि भारत के सांप्रदायिक मुसलमान का मनोबल टूट गया है। मैंने उस समय दो-तीन पोस्ट लिखकर यह संभावना भी व्यक्त की थी कि भारत का मुसलमान बराबरी के साथ रहने के लिए तैयार है, क्योंकि उधर पाकिस्तान और बांग्लादेश की हालत देख रहा है, उधर अफगानिस्तान को देख रहा है और इधर भारत को देख रहा है। तो मेरे विचार से भारत के मुसलमान जैसा सोच रहे थे, उससे मुझे पूरी उम्मीद बनी थी।
लेकिन अभी-अभी जो जाति आरक्षण को लेकर एक सरकारी भूल ने प्रवीण तोगड़िया को सिर उठाने का अवसर दे दिया, कुछ लोगों ने जल्दबाजी कर दी। उस जल्दबाजी से अब फिर भारत के मुसलमान को एक उम्मीद जगने लगी है कि फिर से अब नरेंद्र मोदी, मोहन भागवत, योगी आदित्यनाथ तथा अन्य लोगों को कमजोर किया जा सकता है।
भारत के मुसलमान की इस उम्मीद के साथ-साथ विपक्ष को भी कुछ उम्मीद दिखने लगी है कि भारत का दलित और आदिवासी भी इस टकराव में कूद पड़ेगा। इस तरह हिंदुओं के अंदर जो टकराव शुरू होगा, वह सरकार के लिए एक समस्या पैदा कर देगा। इसलिए अब भारत में सांप्रदायिक मुसलमान की भी सक्रियता बढ़ रही है, उनकी हिम्मत भी बढ़ रही है।
मुझे उम्मीद है कि या तो इन आंदोलनकारियों को अकल आ जाएगी, अन्यथा समाज इन आंदोलनकारियों को कमजोर कर देगा। एक मंगल पांडे की जल्दबाजी से तो हम 100 वर्ष पीछे चले गए थे, अब किसी दूसरे तोगड़िया की जल्दी से यह आरक्षण भी पीछे चला जाएगा। लेकिन हमारे पास परिणाम देखने के लिए अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं है। हम स्वतंत्रता के पहले मंगल पांडे को भी देख चुके हैं और वर्तमान को भी देखना ही पड़ेगा।
हम आंदोलनकारियों की माँग के विरुद्ध नहीं हैं, लेकिन समय के विरुद्ध हैं।
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