भारतीय राजनीति में बदलते नेतृत्व के समीकरण
हम भारत की वर्तमान राजनीति में सत्ता पक्ष और विपक्ष की अलग-अलग समीक्षा कर रहे हैं। कुछ वर्ष पहले यह प्रश्न उठता था कि नरेंद्र मोदी के बाद कौन। सत्ता पक्ष में नरेंद्र मोदी के बाद कोई दिखता नहीं था, कभी-कभी एक-दो आवाज़ गडकरी जी के नाम पर उठ जाया करती थी, लेकिन वह आवाज़ भी बहुत कमजोर थी। लेकिन वर्तमान समय में यह बात दिखने लगी है कि नरेंद्र मोदी के बाद कम से कम तीन लोग तो लाइन में खड़े हैं, उनमें योगी आदित्यनाथ, नितिन गडकरी और अमित शाह, इन तीनों पर अभी सोचा जा सकता है।
इन तीनों में भी योगी आदित्यनाथ की गति बहुत तेज है। जिस तरह योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश जैसे राज्य को पूरी तरह सुधार दिया, यह एक अप्रत्याशित घटना ही मानी जाएगी। अभी तीन-चार दिन पहले ही जो घटना घटी, उसमें एक-दो दिनों के अंदर ही अपराधियों में से दो को गोली मार दी गई। योगी आदित्यनाथ ऑन द स्पॉट तुरंत सजा दे रहे हैं, न कहीं गवाही, न कहीं न्यायालय, न कहीं थाना पुलिस, सारे निर्णय तत्काल हो रहे हैं। नोएडा में कुछ मजदूर नेताओं ने जो उपद्रव किया था, वह भी अब कभी जीवन भर उपद्रव का नाम नहीं लेंगे। संविधान और कानून भी योगी आदित्यनाथ की आँख बंद करके मदद कर रहे हैं, यह बात आश्चर्यजनक है।
अमित शाह ने भी जिस तरह भारत से विदेशी मुसलमान को निकलना शुरू किया है, वह कोई साधारण कार्य नहीं है। अवश्य ही अमित शाह की भी प्रशंसा होनी चाहिए। कश्मीर को शांत करने और भारत को नक्सलवाद मुक्त करने में अमित शाह बहुत आगे रहे हैं। गडकरी जी भी पूरी तरह इथेनॉल नीति में सफल हैं। गडकरी जी का अपना मंत्रालय और साथ-साथ ऊर्जा मंत्रालय में भी बहुत बड़ा योगदान है। इस तरह हम कह सकते हैं कि भारत की राजनीतिक व्यवस्था में सत्तादल बहुत लोकतांत्रिक तरीके से आगे बढ़ रहा है।
नरेंद्र मोदी के बाद कौन, इसका अंतिम निर्णय तो मोहन भागवत जी करेंगे, लेकिन सत्तारूढ़ दल में नरेंद्र मोदी के विकल्प के रूप में कोई कमी नहीं दिख रही है। किस तरह सत्तारूढ़ दल में प्रधानमंत्री पद के योग्य लोग एक साथ मिलकर आपस में सलाह करके सरकार चला रहे हैं, कहीं कोई टकराव नहीं है। मीडिया कभी-कभी टकराव पैदा करने की कोशिश भी करता है, लेकिन इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
आपने सुना होगा कि 6 महीने पहले ही 19 तारीख को प्रधानमंत्री को हटाने और नितिन गडकरी को बनाने का कांग्रेस पार्टी ने ऐलान कर दिया था, लेकिन इसके बाद भी कहीं कोई असर नहीं पड़ा। अब आप देखिए कि विपक्ष का क्या हाल है। विपक्ष में राहुल गांधी नरेंद्र मोदी का विरोध नहीं कर रहे हैं, बल्कि अरविंद केजरीवाल का विरोध कर रहे हैं। राहुल ने पहले नीतीश कुमार को किनारे किया, अब ममता बनर्जी को भी किनारे किया, अब सीधी लड़ाई उनकी अरविंद केजरीवाल से शुरू हुई है। यहां तक कि अरविंद केजरीवाल ने यहां तक घोषणा कर दी है कि राहुल नरेंद्र मोदी के साथ मिलकर उनके खिलाफ योजना बना रहे हैं।
आश्चर्य हुआ कि एक सर्वे में अभी 90 में से 48% लोगों ने नरेंद्र मोदी को पसंद किया और 42% ने विपक्ष में। विपक्ष में 27 वोट राहुल गांधी को मिले और नौ तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय को, लेकिन कांग्रेस पार्टी ने यह घोषणा कर दी कि विजय यदि प्रधानमंत्री की दौड़ में शामिल होंगे तो हम विजय का विरोध करेंगे, क्योंकि प्रधानमंत्री के लिए तो एकमात्र राहुल गांधी हो सकते हैं। यदि दूसरा कोई अन्य विपक्ष में प्रधानमंत्री बनना चाहेगा, पहले उसी से निपट लिया जाएगा, नरेंद्र मोदी से बाद में देख लिया जाएगा।
विपक्ष का हाल है रुई न सूत, जुलाहे में लट्ठ-लट्ठा।
वैसे राहुल गांधी को 27 वोट मिलना संभव नहीं था, लेकिन अरविंद केजरीवाल की बात में दम है कि कहीं सत्ता पक्ष ही राहुल गांधी को इसलिए आगे नहीं बढ़ा रहा है कि अन्य कोई टक्कर में सामने न आ जाए। ऐसा संदेह इसलिए भी होता है कि वर्तमान समय में मीडिया एकतरफा राहुल गांधी को आगे बढ़ा रहा है और मीडिया पर सत्ता की मजबूत पकड़ है। राजनीति में कुछ भी संभव है।
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