सुधार वर्तमान व्यवस्था में, परिवर्तन केवल संवैधानिक व्यवस्था में

10 सितंबर प्रातःकालीन सत्र। हम एक तरफ व्यवस्था परिवर्तन की मांग कर रहे हैं, दूसरी तरफ हम वर्तमान व्यवस्था में सुधार पर भी चर्चा कर रहे हैं। हमारी व्यवस्था परिवर्तन में सिर्फ एक मांग है कि वर्तमान सरकार, संसद या तंत्र, वर्तमान संविधान संशोधन में लोक की कोई अन्य भूमिका को भी स्वीकार कर ले। इसका मतलब यह है कि संविधान संशोधन का अंतिम अधिकार उस इकाई के पास नहीं होना चाहिए, जो इकाई कानून भी बनाती है, लागू भी करती है। हम चाहते हैं कि संविधान संशोधन में तंत्र के साथ-साथ किसी अन्य इकाई की भी समान भूमिका हो। वह इकाई क्या हो, इस तरह की बात अलग से हो सकती है। तरीका अलग से सोचा जा सकता है, लेकिन हम व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर तंत्र से सिर्फ एक बदलाव चाहते हैं और वह है कि संविधान संशोधन में उसकी सहभागी की भूमिका हो, अंतिम नहीं।

अन्य सभी बातें हम वर्तमान व्यवस्था में सुधार की कर सकते हैं। इसके लिए हम सरकार को सुझाव देते रहते हैं और भविष्य में भी देते रहेंगे। आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, सब प्रकार की व्यवस्था में आई कमजोरी पर हम लगातार चिंतन-मंथन कर रहे हैं। हम सुझाव भी दे रहे हैं, हम उस पर जन-जागरण भी कर रहे हैं, लेकिन हम संवैधानिक व्यवस्था परिवर्तन के मामले में सिर्फ एक मांग पर खड़े हुए हैं और वह है तंत्र-मुक्त, संविधान-युक्त समाज व्यवस्था। स्पष्ट है कि समाज व्यवस्था को तंत्र-मुक्त होना चाहिए और उसका माध्यम है एक स्वतंत्र संविधान।