मनुष्य का शरीर प्राकृतिक रूप से ऐसा बनाया गया है कि उसके भीतर संस्कार और विचार—दोनों का समावेश रहता है।

          17 दिसंबर प्रातः कालीन सत्र मनुष्य का शरीर प्राकृतिक रूप से ऐसा बनाया गया है कि उसके भीतर संस्कार और विचार—दोनों का समावेश रहता है। विचार तर्क से बनते हैं और संस्कार श्रद्धा से।

किसी व्यक्ति में संस्कार अधिक होते हैं, तो किसी में विचार अधिक। सामान्यतः समाज में बुद्धि-प्रधान (विचारक) और भावना-प्रधान (संस्कारयुक्त) लोगों के बीच लगभग 1 : 10 का अनुपात होता है। अर्थात् लगभग 10% लोग बुद्धि-प्रधान होते हैं और 90% लोग भावना-प्रधान, जिन्हें हम संस्कारित कहते हैं। वर्तमान समय में भी यह प्रतिशत लगभग वैसा ही है।

लेकिन यह संतुलन इसलिए गड़बड़ा गया है क्योंकि आज बुद्धि-प्रधान लोगों का बड़ा हिस्सा कम्युनिस्ट हो गया है, और भावना-प्रधान लोगों का बड़ा हिस्सा धर्म-प्रधान हो गया है।

कम्युनिस्ट सामान्यतः चालाक होता है और सबसे बड़ी समस्या यह है कि दो बुद्धि-प्रधान व्यक्ति लंबे समय तक एक साथ नहीं रह पाते। वे प्रायः टकरा जाते हैं, क्योंकि एक बुद्धि-प्रधान व्यक्ति दूसरे बुद्धि-प्रधान व्यक्ति को सहज रूप से स्वीकार नहीं कर पाता। यही कारण है कि जहाँ-जहाँ कम्युनिस्टों ने सत्ता प्राप्त की, वहाँ गैर-कम्युनिस्ट बुद्धिजीवियों को समाप्त कर दिया गया। विश्व इतिहास इसका साक्षी है कि कम्युनिस्ट किसी गैर-कम्युनिस्ट बुद्धिजीवी को जीवित नहीं रहने देता।

सौभाग्य से भारत आज भी गैर-कम्युनिस्ट है और अब तक बचा हुआ है। फिर भी भारत में बुद्धिजीवियों की संख्या घटती जा रही है, जबकि भावना-प्रधान और संस्कारित लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। इस असंतुलन को दूर करना आवश्यक है, क्योंकि बुद्धि-प्रधान लोगों में से ही विवेक-प्रधान लोग निकलते हैं, जबकि संस्कार-प्रधान लोगों में से विवेक-प्रधान लोग निकल पाना कठिन होता है।

इसीलिए हम इस संतुलन को बनाने का प्रयास कर रहे हैं—अर्थात् समाज में बुद्धि-प्रधान और भावना-प्रधान लोगों का अनुपात 1 : 10 बना रहे, और जो बुद्धि-प्रधान हों, वे विवेक-प्रधान हों, कम्युनिस्ट न हों।
हमें समाज को कम्युनिस्टों से बचाना ही होगा।