मैंने चार–पाँच बच्चों के सामने यह बात रखी कि तुम लोग धीरे-धीरे एक नए तरीके से चलना सीखो।

17 जनवरी, प्रातःकालीन सत्र।

मैंने कल राजनीतिक सत्ता से यह निवेदन किया था कि मुझे तुमसे कुछ भी नहीं चाहिए, मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो। उसी बात को आगे बढ़ाते हुए आज मैं एक प्रयोग आपके सामने रख रहा हूँ।

मैंने चार–पाँच बच्चों के सामने यह बात रखी कि तुम लोग धीरे-धीरे एक नए तरीके से चलना सीखो। जब बायाँ पैर आगे बढ़े तो दायाँ हाथ आगे बढ़ाओ और जब दायाँ पैर आगे बढ़े तो बायाँ हाथ आगे बढ़ाओ। इस तरह चलोगे तो तुम्हें सुविधा रहेगी। मैंने उन बच्चों को बहुत देर तक प्रशिक्षण दिया, लेकिन वे लोग एक साथ इस तरीके से चलना नहीं सीख सके। मैंने बहुत कोशिश की, पर उनसे बार-बार गलतियाँ होती रहीं।

अंत में मैंने उनसे कहा कि अच्छा, अब तुम लोग अपने तरीके से चलो। यह देखकर आश्चर्य हुआ कि सभी बच्चे बायाँ पैर बढ़ाते समय दायाँ हाथ और दायाँ पैर बढ़ाते समय बायाँ हाथ आगे बढ़ा रहे थे, और बिल्कुल उसी तरीके से चल रहे थे जैसा मैंने पहले सुझाव दिया था।

यह स्पष्ट है कि समाज अपने पारंपरिक तरीके से स्वयं ठीक चलता है। वह गलतियाँ तब करता है जब उसे राज्य सत्ता किसी अलग तरीके से चलने के लिए मजबूर करती है। यदि परिवार व्यवस्था, ग्राम व्यवस्था और समाज व्यवस्था को—जब तक वे कोई अपराध नहीं कर रही हों—अपने तरीके से चलने दिया जाए, तो समाज भी ठीक से चलने लगेगा और राज्य की सक्रियता भी कम हो जाएगी।

मेरा राज्य से यही निवेदन है कि वह समाज को चलने दे, बीच में अनावश्यक छेड़छाड़ न करे।