आरक्षण, यूजीसी और समाज की नई व्यवस्था पर बहस

मैं पिछले लगभग एक महीने से बहुत परेशान था। किसी भी विषय पर कुछ भी लिखता था, तो कुछ तथाकथित ब्राह्मण जबरदस्ती “अग-अग” चलाना शुरू कर देते थे। मैं टालने की कोशिश भी करता था, लेकिन वे घूम-फिरकर फिर उसी बात पर आ जाते थे।
फिर मैंने यह समझाने का प्रयास किया कि हम यह प्रस्ताव रखते हैं कि सरकारी कर्मचारियों, नेताओं, न्यायाधीशों या अन्य पदों पर बैठे लोगों के वेतन, भत्ते और सुविधाएँ पूरी तरह बाज़ार दर के अनुसार कर दी जाएँ और सभी प्रकार के आरक्षण समाप्त कर दिए जाएँ। इस पर भी वे तैयार नहीं हुए।
इसके बाद मैंने एक और सुझाव दिया कि डीज़ल, पेट्रोल, बिजली, केरोसिन, कोयला और गैस—इन सबका मूल्य बढ़ाकर अन्य सभी प्रकार के टैक्स समाप्त कर दिए जाएँ। इस बात पर भी वे तैयार नहीं हुए।
फिर मैंने यह प्रस्ताव दिया कि जन्म से जाति मानने के बजाय किसी परीक्षा में पास होने के बाद ही जातियाँ और वर्ण निर्धारित किए जाएँ। इस पर भी वे तैयार नहीं हुए। अंत में हार-थककर मैं चुप हो गया।
अब यूजीसी की चर्चा धीरे-धीरे कम हो रही है, क्योंकि सच यह है कि यूजीसी की गलती को सुप्रीम कोर्ट ने सुधार दिया है और अब उसमें कुछ विशेष बचा नहीं है। लेकिन कल मैंने किसी विषय पर लिखा, तो फिर एक तथाकथित ब्राह्मण देवता, शर्मा जी, ने “अग-अग” लिखना शुरू कर दिया। उन्होंने यहाँ तक लिख दिया कि यदि सरकार ने अपनी गलती नहीं सुधारी, तो भारत में गृहयुद्ध हो जाएगा।
तब वास्तव में मुझे बहुत बुरा लगा और मैंने उस व्यक्ति को लिख दिया कि बिना मतलब किसी भी पोस्ट में आकर इस तरह “अग-अग” मत चलाया करो। बाद में मैंने उनका इतिहास देखा तो पता चला कि उन्होंने भारतीय जनता पार्टी को भी धमकी दी थी कि यदि भगत जी को लोकसभा का टिकट नहीं दिया गया, तो वे विद्रोह कर देंगे। अब आप स्वयं सोच सकते हैं कि किस प्रकार के लोग अनावश्यक इस तरह की धमकियाँ देते हैं।
मैं अंत में पुनः कहना चाहता हूँ कि यूजीसी के मामले पर हम सब बैठकर विचार करेंगे। जो भी निष्कर्ष निकलेगा, सरकार उसे मानेगी। लेकिन यदि यूजीसी के नाम पर कोई दुकानदारी करना चाहता है, तो उसे मुँहतोड़ जवाब भी दिया जाएगा।
मैंने कल यूजीसी और स्वर्ण आंदोलन पर अपने विचार व्यक्त किए थे। उस पर बहुत गंभीर चर्चा हुई और कई लोगों ने गंभीरता से उसमें भाग लिया। इससे मुझे खुशी हुई। उसी बात को आगे बढ़ाते हुए मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूँ कि मैं शुरू से ही आरक्षण के खिलाफ रहा हूँ।
मेरे विचार से स्वतंत्रता से पहले जो जातीय आरक्षण था, वह बहुत घातक था, और स्वतंत्रता के बाद जो आरक्षण लागू हुआ, वह भी उस समस्या का समाधान न होकर उसकी बुराइयों को और बढ़ाने वाला सिद्ध हुआ। इसलिए वर्तमान समय में आरक्षण की समस्या को पूरी तरह समाप्त करने की आवश्यकता है।
वर्तमान समय में यूजीसी के बहाने स्वर्ण समाज ने जो जोरदार आवाज उठाई है, वह इस समाधान में सहायक हो सकती है, क्योंकि उसके कुछ सकारात्मक परिणाम भी दिखाई देने लगे हैं। एक ओर राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेता अब जातीय जनगणना और जातीय आरक्षण बढ़ाने की मांग अपेक्षाकृत कम कर रहे हैं, तो दूसरी ओर सरकार और अन्य नेता भी आरक्षण की समस्या पर गंभीरता से विचार करने लगे हैं।
यदि स्वर्ण समाज ने इतना उग्र रूप नहीं दिखाया होता, तो संभव है कि इस प्रकार की चर्चा शुरू ही नहीं हो पाती।
यह अवश्य है कि यदि आरक्षण समाप्त करने के नाम पर स्वतंत्रता से पहले की व्यवस्था को लागू करने का प्रयास किया गया, तो हम उस व्यवस्था का भी पुरजोर विरोध करेंगे। हम किसी भी प्रकार के आरक्षण के खिलाफ हैं—चाहे वह स्वतंत्रता से पहले का हो या स्वतंत्रता के बाद का। हम एक नई प्रकार की समाज व्यवस्था के पक्षधर हैं।
अंत में मैं अपने स्वर्ण मित्रों को धन्यवाद देते हुए यह भी कहना चाहूँगा कि वे आरक्षण का विरोध करते समय उसका कोई ठोस और व्यावहारिक समाधान भी अवश्य प्रस्तुत करें।