लोकतांत्रिक ढाँचे में समाज को कमजोर करने की राज्य की रणनीति
7 मार्च, प्रातःकालीन सत्र।
राज्य लोकतांत्रिक तरीकों से समाज को नियंत्रित या गुलाम बनाने के लिए जिन उपायों का उपयोग करता है, उनमें एक प्रमुख उपाय यह है कि वह मनोवैज्ञानिक प्रचार के माध्यम से समाज में यह धारणा फैलाता है कि समाज से ऊपर राष्ट्र है और समाज से ऊपर धर्म है। जब धर्म और राष्ट्र को समाज से ऊपर स्थापित कर दिया जाता है, तब धीरे-धीरे “समाज” शब्द की परिभाषा ही बदल दी जाती है। परिणामस्वरूप जातियाँ समाज बन जाती हैं, संगठन समाज बन जाते हैं और धार्मिक संस्थाएँ समाज का स्थान लेने लगती हैं।
इस प्रकार राज्य अपने षड्यंत्र में सफल हो जाता है। एक ओर वह समाज को अलग-अलग टुकड़ों में विभाजित कर देता है, और दूसरी ओर समाज से ऊपर धर्म और राष्ट्र को स्थापित कर देता है। यही कारण है कि राष्ट्र की जगह राज्य सर्वोच्च बन जाता है और धर्म की जगह संप्रदाय ऊपर स्थापित हो जाता है। परिणामस्वरूप सामाजिक एकता छिन्न-भिन्न हो जाती है।
इस षड्यंत्र को विफल करने के लिए हमें एकजुट होकर प्रयास करना होगा। समस्या बहुत बड़ी है, लेकिन उसका समाधान भी हमें ही करना होगा, क्योंकि प्रचार माध्यमों का सहारा लेकर राज्य इस प्रकार की भ्रांति लगातार फैलाता रहता है।
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