Iran–Israel युद्ध और भारत की नीति: टकराव या समझदारी?

ईरान और इज़रायल के बीच युद्ध चल रहा है और अमेरिका इज़रायल का समर्थन कर रहा है। अब तक ईरान के समर्थन में दुनिया का कोई प्रमुख देश खुलकर सामने नहीं आया है। अधिकांश देश अभी चुपचाप परिस्थितियों को देख रहे हैं और प्रतीक्षा की नीति अपना रहे हैं।
लेकिन भारत एक ऐसा देश है जहाँ की राजनीति इस मुद्दे पर लगभग दो गुटों में बँटती दिखाई दे रही है। मेरा मानना है कि भारत के मुसलमानों और कम्युनिस्टों का झुकाव स्वाभाविक रूप से ईरान की ओर हो सकता है, क्योंकि उनके अपने वैचारिक कारण हो सकते हैं। परंतु भारत में कई विपक्षी दल भी खुले रूप से ईरान के पक्ष में खड़े दिखाई दे रहे हैं, जबकि Narendra Modi की सरकार और Bharatiya Janata Party अपेक्षाकृत संयमित रुख रखते हुए अप्रत्यक्ष रूप से इज़रायल के पक्ष में दिखाई देते हैं।
भारत के अधिकांश हिंदू भी इज़रायल के समर्थन में दिखाई देते हैं, जबकि विपक्षी दलों से जुड़े कुछ हिंदू नेता ईरान के पक्ष में बोलते हुए दिखाई देते हैं। जो लोग ईरान के साथ खड़े हैं, वे लगातार यह आरोप लगा रहे हैं कि मोदी सरकार डर गई है, समझौते कर रही है और भारत के सम्मान को नुकसान पहुँचा रही है।
दूसरी ओर बहुत से लोग यह मानते हैं कि वर्तमान परिस्थितियों में समझदारी इसी में है कि अनावश्यक टकराव से बचा जाए। उनके अनुसार सम्मान के नाम पर किसी बड़ी शक्ति से सीधा संघर्ष मोल लेना व्यावहारिक नीति नहीं है। उनका तर्क है कि किसी भी देश को अपनी वास्तविक शक्ति और परिस्थितियों को ध्यान में रखकर ही निर्णय लेना चाहिए।
इसी कारण आज एक बड़ा प्रश्न सामने खड़ा है—वर्तमान परिस्थितियों में कौन-सा रास्ता अधिक उचित है? आत्मसम्मान के नाम पर अमेरिका और इज़रायल जैसी शक्तियों से टकरा जाने वाला ईरान, या फिर अपनी शक्ति और परिस्थिति को तौलकर समझौते की नीति अपनाने वाला भारत?
मेरे विचार से टकराव से बचने और परिस्थितियों को समझते हुए समझौता करने की नीति अधिक व्यावहारिक है। अनावश्यक संघर्ष से बचना कई बार राष्ट्रहित में अधिक उपयोगी साबित होता है। इसी दृष्टि से मैं टकराव से बचने वाली नीति का समर्थन करता हूँ। वहीं कुछ विपक्षी नेताओं, जैसे Rahul Gandhi, की आक्रामक आलोचना की शैली से मैं सहमत नहीं हूँ।