ईरान के संघर्ष से मिलती सीख: कायरता, हिंसा और समाज की चुनौती

पूरी दुनिया में एक ओर कायरता बढ़ रही है और दूसरी ओर हिंसा भी बढ़ रही है। इन दोनों प्रवृत्तियों का एक साथ बढ़ना वर्तमान समाज की एक बड़ी समस्या बन गया है। लगभग यही स्थिति भारत की भी है और कुछ हद तक Iran की भी दिखाई देती है। पश्चिम के कुछ देशों में यह अंतर अपेक्षाकृत कम है, लेकिन अन्य कई देशों में यह बहुत अधिक दिखाई देता है।

इसी कारण भारत में भी आम लोगों के बीच यह धारणा बनती जा रही है कि वे शक्तिशाली के सामने कायर हो जाते हैं और कमजोर के सामने हिंसक हो उठते हैं। धरातल पर हिंदुओं और मुसलमानों के व्यवहार में कुछ अंतर देखने की बात भी कही जाती है। कई लोग यह मानते हैं कि हिंदू समाज में व्यक्ति प्रायः या तो कायर दिखाई देता है या अहिंसक रहता है, जबकि मुसलमान समाज में कई बार आक्रामकता अधिक दिखाई देती है। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि जब कोई व्यक्ति बल प्रयोग की बात करता है तो उसके समर्थन में लोग जल्दी एकत्र हो जाते हैं, क्योंकि सामाजिक और धार्मिक भावनाएँ उसमें जुड़ जाती हैं।

भारत में भी धीरे-धीरे ऐसे ही संस्कार कुछ लोगों के बीच बढ़ते हुए दिखाई दे रहे हैं। यदि कोई धर्मगुरु हिंसा या बल प्रयोग की भाषा बोलता है, तो उसके समर्थन में बड़ी संख्या में लोग खड़े हो जाते हैं। परंतु यह एक सामाजिक कमजोरी मानी जा सकती है। विचारकों और समाज के जिम्मेदार लोगों का कर्तव्य है कि वे इस समस्या का समाधान खोजने का प्रयास करें।

आतंकवाद और उग्रवाद जैसी समस्याओं का सामना करने के लिए समाज में एकता आवश्यक है, लेकिन यह भी उतना ही आवश्यक है कि उस एकता का नेतृत्व विवेकशील और संतुलित लोगों के हाथ में हो, न कि उग्र या हिंसक विचारों वाले लोगों के हाथ में।

कई विश्लेषक यह भी मानते हैं कि दुनिया के कई हिस्सों में मुस्लिम समाज को जो कठिनाइयाँ झेलनी पड़ रही हैं, उनमें एक कारण यह भी रहा है कि लंबे समय तक कट्टर और उग्र विचारों को प्राथमिकता दी गई। आज वही प्रवृत्ति कई बार उनके लिए समस्या बन जाती है।

इसलिए वर्तमान अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों, जैसे Iran से जुड़े संघर्षों से भी यह सीख मिलती है कि किसी भी समाज को अपने निर्णय भावनाओं के आधार पर नहीं, बल्कि सोच-समझ और सूझबूझ के साथ लेने चाहिए। भारत में भी हिंदू समाज के लिए यह आवश्यक है कि वह समस्याओं का समाधान संयम, विवेक और संतुलित नेतृत्व के माध्यम से खोजे, न कि कट्टरता या भावनात्मक उग्रता के आधार पर।