राहुल गांधी और विपक्ष का वैचारिक द्वंद्व
वर्तमान समय में राहुल गांधी तथा अन्य विपक्षी दल आत्ममंथन कर रहे हैं। उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि उन्हें किस दिशा में चलने की आवश्यकता है, क्योंकि एक तरफ कम्युनिस्ट और विदेशी ताकतें उन्हें हिंदुओं के विरुद्ध मजबूती से खड़े रहने की सलाह दे रही हैं, तो दूसरी तरफ कुछ शंकराचार्य, प्रवीण तोगड़िया, उद्धव ठाकरे, सुब्रमण्यम स्वामी तथा अन्य लोग यह सलाह दे रहे हैं कि भारत में हिंदुओं का विरोध करके उनका कोई भविष्य नहीं है।
वर्तमान समय में यूजीसी के मामले में भी राहुल गांधी यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि उन्हें क्या करना चाहिए। कभी उन्हें ऐसा लगता है कि फिर से जनेऊ दिखाने की आवश्यकता है और मंदिरों में जाना चाहिए, तो दूसरी तरफ उन्हें जातिवाद और साम्यवाद से भी चिंता हो रही है। यदि कम्युनिस्ट या मुसलमान नाराज़ हो जाते हैं, तो उन्हें अपना भविष्य अनिश्चित दिखाई देता है।
यही कारण है कि आजकल राहुल गांधी चुप रहकर गंभीरता से विचार-मंथन कर रहे हैं। यह प्रश्न भी उठता है कि क्या उन्हें प्रवीण तोगड़िया और उद्धव ठाकरे की बात मानकर फिर से हिंदुत्व की राह पर चलना चाहिए, या फिर जातीय जनगणना, पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान, ईरान, फ़िलिस्तीन और साम्यवाद जैसे मुद्दों पर आगे बढ़ना चाहिए।
राहुल गांधी संभवतः कोई बीच का रास्ता निकालना चाहते हैं, जो उन्हें अभी तक नहीं मिल पाया है। उन पर अरविंद केजरीवाल और अखिलेश यादव का भी दबाव बताया जाता है कि उन्हें सवर्ण हिंदुओं को साथ लेकर चलना चाहिए।
संभावना है कि वर्तमान में चल रहे चुनावों के बाद राहुल गांधी कोई निर्णय लें, लेकिन यह कहना कि उनका हर निर्णय गलत ही होगा, एक व्यक्तिगत राय है।
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