नई समाज व्यवस्था: कल्पना से यथार्थ की ओर
13 अप्रैल प्रातः कालीन सत्र – नई समाज व्यवस्था पर चर्चा।
हम जिस नई समाज व्यवस्था का प्रारूप प्रस्तुत कर रहे हैं, वह अभी काल्पनिक है। जब यह यथार्थ में लागू होगा, तब एक प्रकार का युग परिवर्तन प्रारंभ होगा—अर्थात हम कलयुग से सतयुग की ओर बढ़ना शुरू करेंगे। यह परिवर्तन कब होगा, यह अभी संभावनाओं के स्तर पर है।
इस नई समाज व्यवस्था में आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, वैश्विक तथा प्राकृतिक—सभी प्रकार की समस्याओं के समाधान के मार्ग खुल सकते हैं। इसी क्रम में संवैधानिक समस्याओं के समाधान पर भी विचार किया जा रहा है। हम इन समाधानों की शुरुआत भारत से करने का विचार रखते हैं, और वर्तमान में विशेष रूप से संवैधानिक सुधारों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।
मैंने यह निष्कर्ष निकाला है कि संवैधानिक समस्याओं के समाधान के लिए भारत का एक संशोधित संविधान बनाया जाना चाहिए, जिसके पाँच आधारभूत सिद्धांत होंगे। इन पाँच सिद्धांतों में से एक सिद्धांत समान नागरिक संहिता से संबंधित है, जिस पर पिछले कुछ दिनों से विस्तार से चर्चा की जा चुकी है।
इन्हीं पाँच आधारभूत सिद्धांतों में एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है—अपराध नियंत्रण की गारंटी। अब हम अगले चार–पाँच दिनों तक इसी विषय पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
स्पष्ट है कि अपराध नियंत्रण की गारंटी सरकार की जिम्मेदारी होगी, क्योंकि समाज ने इस कार्य के लिए जिस विशेष तंत्र (विंग) का निर्माण किया है, उसी को हम सरकार कहते हैं। अर्थात अपराध नियंत्रण का दायित्व सरकार नामक व्यवस्था पर ही निहित होगा।
सरकार के दायित्व क्या होंगे, उसकी शक्तियाँ क्या होंगी, और उसकी सीमाएँ क्या होंगी—ये सभी बातें संविधान में स्पष्ट रूप से निर्धारित की जाएँगी। साथ ही, अपराध नियंत्रण के लिए सरकार की जिम्मेदारी कितनी होगी, यह भी संविधान में स्पष्ट रूप से लिखा जाएगा।
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