सुप्रीम कोर्ट : अतीत से वर्तमान तक की यात्रा

20-30 वर्ष पहले की बात है। उस समय भी भारत में यही सुप्रीम कोर्ट था, आज भी वही सुप्रीम कोर्ट है। उस समय भी यही संविधान था, आज भी यही संविधान है। कानून में भी कोई बदलाव नहीं हुआ है, लेकिन भारत के सुप्रीम कोर्ट में आसमान-जमीन का फर्क आ गया है।

उस समय के सुप्रीम कोर्ट में अधिकांश न्यायाधीश कम्युनिस्ट बनते थे। उस समय के सुप्रीम कोर्ट में प्रशांत भूषण और कपिल सिब्बल की दादागिरी चलती थी। उस समय के सुप्रीम कोर्ट में नक्सलवादियों और मुसलमानों के लिए दया का खजाना खुला रहता था।

लेकिन आज वही सुप्रीम कोर्ट है और इस सुप्रीम कोर्ट में प्रशांत भूषण और कपिल सिब्बल के आँसू नहीं रुक रहे हैं। इन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि ऐसे बुरे दिन भी आ सकते हैं।

आज सुप्रीम कोर्ट में जो मुख्य न्यायाधीश हैं, वे तो एक नया कीर्तिमान बनाते जा रहे हैं। वर्तमान सुप्रीम कोर्ट ने सभी संवैधानिक संस्थाओं को ताकत दी है। यदि भारत का सुप्रीम कोर्ट इसी तरह कुछ वर्षों तक चलता रहा, तो समाज-विरोधी और देश-विरोधी ताकतों का सुप्रीम कोर्ट से सफाया हो जाएगा।