महंगाई का झूठा हल्ला: परिभाषा की भूल या समझ का संकट?

11 जून प्रातःकालीन सत्र

दुनिया भर में फैली असत्य परिभाषाओं की सही परिभाषा पर चर्चा कर रहे हैं। कल हम लोगों ने बेरोजगारी पर लंबी चर्चा की थी। आज हम चर्चा कर रहे हैं कि महंगाई का झूठा हल्ला लगातार बढ़ता जा रहा है। महंगाई की वर्तमान परिभाषा पूरी तरह गलत है। महंगाई और मुद्रास्फीति को अलग-अलग करके देखा जाना चाहिए। दूसरी बात यह है कि महंगाई का जीवन पर प्रभाव किस तरह पड़ रहा है, उसका भी अलग से आकलन होना चाहिए।

मेरे विचार में भारत में महंगाई लगातार घट रही है, क्योंकि महंगाई की परिभाषा होती है— वस्तु का मूल्य ÷ मुद्रा स्थिति = महंगाई। इस तरह नई परिभाषा के अनुसार सोना, चांदी, जमीन छोड़कर बाकी सब चीजें सस्ती हो रही हैं। खाद्य पदार्थ, दूध, कपड़ा बहुत सस्ता हो गया है और घड़ी, रेडियो, मोबाइल तो मिट्टी के भाव मिल रहे हैं। फिर भी महंगाई का झूठा हल्ला किया जा रहा है।

इसी तरह महंगाई के प्रभाव की भी चर्चा करें, तो जब महंगाई बढ़ती है, तो सोना, चांदी और जमीन के मूल्य घटते हैं। भारत में क्रय शक्ति लगातार बढ़ रही है, आम लोगों की बचत बढ़ रही है, सोना, चांदी, जमीन और शेयर मार्केट में पैसा लग रहा है। इसके बाद भी नासमझ लोग महंगाई बढ़ने का हल्ला कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें महंगाई की परिभाषा ही नहीं पता है।

इसलिए मेरा उन सब से निवेदन है कि आप ऋषि-मुनियों से महंगाई की नई परिभाषा समझें। झूठा हल्ला समाज में न करें। महंगाई को मुद्रास्फीति से और महंगाई के प्रभाव को क्रय शक्ति के साथ तुलना करके ही निष्कर्ष निकालिए।