समाज और राज्य के संबंधों पर नई दृष्टि
23 जुलाई, प्रातःकालीन सत्र
हम इस बात पर गहराई से चिंतन कर रहे हैं कि व्यक्ति और समाज—ये सिर्फ दो ही मौलिक इकाइयाँ हैं, जो प्राकृतिक हैं। बाकी बीच की सभी इकाइयाँ व्यक्ति और समाज ने मिलकर बनाई हैं और ये व्यवस्था की इकाइयाँ हैं।
राज्य समाज का मैनेजर है, प्रतिनिधि है या संरक्षक है—यह बात गंभीरता से सोची जानी चाहिए। कोई भी एक इकाई संरक्षक, प्रतिनिधि और मैनेजर—ये तीनों एक साथ नहीं हो सकती, क्योंकि यदि मैनेजर और संरक्षक एक ही व्यक्ति या संस्था होंगे, तो फिर समाज गुलाम बन जाएगा, जो समाज का उद्देश्य नहीं है।
इसलिए हम वर्तमान समय में गंभीरता से इस बात पर चिंतन कर रहे हैं कि यदि समाज बहुत बड़ी इकाई होने के कारण स्वयं भौतिक रूप से मालिक की भूमिका में नहीं रह सकता, तब ऐसी कौन-सी व्यवस्था बनाई जा सकती है, जो समाज के प्रतिनिधि के रूप में मैनेजर के कार्यों की समीक्षा करे। इस प्रतिनिधि को ही पावर ऑफ अटॉर्नी कहा जा सकता है। हम उसे संरक्षक तो नहीं कह सकते, लेकिन प्रतिनिधि अवश्य कह सकते हैं।
ऐसी व्यवस्था बननी आवश्यक है। जब तक ऐसी व्यवस्था नहीं बनती, तब तक राज्य अपने को मैनेजर और संरक्षक—दोनों मान रहा है। राज्य अपने को प्रतिनिधि भी मान रहा है। यह कैसे संभव है कि राज्य समाज का प्रतिनिधि भी हो जाए, कस्टोडियन भी हो जाए और मैनेजर भी हो जाए?
इसलिए हम चाहते हैं कि इस विषय पर गंभीरता से चर्चा की जाए और कोई नया तरीका खोजा जाए। यह सिर्फ भारत का प्रश्न नहीं है, बल्कि दुनिया के लोकतंत्र के सामने एक नई चुनौती है।
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