युवा शक्ति के साथ बढ़ता नशा और आक्रोश
12 अगस्त प्रातः कालीन सत्र। सारे देश में युवा शक्ति मजबूत हो रही है। दूसरी ओर युवाओं में हर प्रकार का नशा बढ़ रहा है। यहाँ तक कि अनेक प्रकार के ड्रग्स का भी प्रयोग बढ़ रहा है। नरेंद्र मोदी जी ने भी इस पर बहुत चिंता व्यक्त की है। इस नई पीढ़ी में हिंसा और आक्रोश भी बढ़ रहा है। इस नई पीढ़ी में स्वार्थ भी लगातार बढ़ रहा है। यह नई पीढ़ी जितना जानती है, उससे कई गुना ज्यादा घमंड भी बढ़ रहा है।
इन सब परिस्थितियों में हमें गंभीरतापूर्वक सोचना पड़ेगा कि क्या किसी परिवार में पीढ़ियों को अलग-अलग परिभाषित करना उचित होगा? मेरे विचार से नहीं। परिवार में पीढ़ियों का फर्क नहीं होता, योग्यता का फर्क होता है।
मेरे विचार से शराबबंदी के लिए भी, नशाबंदी के लिए भी, हिंसा, आक्रोश और स्वार्थ पर नियंत्रण के लिए भी परिवार व्यवस्था सबसे अच्छा माध्यम है। सरकार को इस मामले में तब तक दखल नहीं देना चाहिए, जब तक किसी ने कोई अपराध न किया हो। मैं प्रधानमंत्री के प्रवचन तक सहमत हूँ, लेकिन अगर हमारी सरकार नशाबंदी के लिए किसी प्रकार के कानून बनाती है, वह कानून निश्चित रूप से असफल होगा, क्योंकि जब तक परिवार इस दिशा में सक्रिय नहीं होगा, तब तक युवाओं में मिलने वाली यह बुराइयाँ नियंत्रित नहीं होंगी।
परिवार सक्रिय होगा, समाज व्यवस्था से, धर्म व्यवस्था से, राज्य व्यवस्था से नहीं। राज्य व्यवस्था परिवारों को पूरी स्वतंत्रता दे। मुझे पूरी उम्मीद है कि नशाबंदी सफल हो सकती है।
Comments