मैं माँ संस्थान द्वारा आयोजित भगवान बुद्ध पर आधारित एक स्वतंत्र चर्चा कार्यक्रम सुनने लगा
18 दिसंबर : प्रातःकालीन सत्र
कल रात 8:00 बजे मैं माँ संस्थान द्वारा आयोजित भगवान बुद्ध पर आधारित एक स्वतंत्र चर्चा कार्यक्रम सुनने लगा। इस चर्चा में 12 वक्ताओं ने अपने-अपने विचार प्रस्तुत किए। सभी वक्ताओं के विचार स्वतंत्र थे, तर्कपूर्ण थे और किसी पूर्व प्रतिबद्धता से मुक्त थे। इन विचारों को सुनकर नई-नई जानकारियाँ मिलीं और मन को गहरी प्रसन्नता हुई।
इसके बाद मैंने भारत की संसद की चर्चा सुननी शुरू की और रात 1:30 बजे तक उसे सुनता रहा। किंतु वह पूरी चर्चा बिकाऊ प्रतीत हुई। कहीं कोई तर्क नहीं था, कहीं कोई स्वतंत्र विचार नहीं था। कोई भी वक्ता अपने मन से नहीं बोल रहा था—सब प्रतिबद्ध थे, बंधे हुए थे। संसद की चर्चा सुनने के बाद मुझे आत्मग्लानि हुई कि मैंने रात में अपनी नींद व्यर्थ कर दी। मुझे यह भी निश्चित लगा कि यदि सुबह टीवी पर देखूँगा, तो वही घिसी-पिटी बातें दोहराई जाएँगी।
दुख की बात यह है कि हमारा साहित्यकार भी बिक गया है, वह भी प्रतिबद्ध हो गया है। जिस समाज में साहित्य, विचारक और धर्मगुरु स्वतंत्रता को छोड़कर प्रतिबद्धता को अपना लेते हैं, वह समाज गहरे संकट में होता है। आज भारत में लगभग हर क्षेत्र प्रतिबद्ध हो चुका है। इसलिए अब यह अत्यंत आवश्यक हो गया है कि समाज को स्वतंत्रता का महत्व समझाया जाए।
प्रतिबद्धता और स्वतंत्रता—दोनों का संतुलन आवश्यक है। वर्तमान समय में स्वतंत्रता का स्थान एक ओर उद्दंडता ने ले लिया है और दूसरी ओर गुलामी ने। ये दोनों ही स्थितियाँ घातक हैं।
अतः मेरा सुझाव है कि हमें इस प्रकार की प्रतिबद्ध इकाइयों की चर्चाओं में अपनी नींद खराब करने की मूर्खता नहीं करनी चाहिए। इसके स्थान पर हमें अप्रतिबद्ध, स्वतंत्र और तर्कपूर्ण चर्चाओं को महत्व देना शुरू करना चाहिए।
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