नेहरू की अर्थनीति से बाहर निकलने पर श्रम मूल्य में तेज वृद्धि

मैंने अपने जीवन के 87 वर्षों में बहुत कुछ बदलाव पाया है। स्वतंत्रता के समय श्रम का मूल्य सिर्फ 40 पैसे प्रतिदिन के आसपास था। यह बढ़कर 2005 में, अर्थात 60 वर्षों के बाद, ₹40 हो गया था। लेकिन जब तक नेहरू जी की अर्थनीति रही, तब तक इसी की गति बहुत कम थी। 91 के बाद श्रम मूल्य में कुछ अधिक अच्छा सकारात्मक बदलाव हुआ, लेकिन 2014 के बाद इसकी गति बहुत अधिक तेज हुई, क्योंकि नेहरू जी सब कुछ सरकारी करना चाहते थे, बाजार को पूरी तरह बर्बाद कर रहे थे, उद्योगपतियों को असफल कर रहे थे। उनके दिमाग में सिर्फ राष्ट्रीयकरण था। यही कारण था कि श्रम मूल्य बढ़ने की गति बहुत कम थी।

अब वर्तमान समय में श्रम का मूल्य स्वतंत्रता से अब तक लगभग 800 से 1000 गुना तक अधिक बढ़ चुका है। जो श्रम मूल्य 2005 में ₹40 था, वह आज 2025 में ₹400 हो चुका है। इसका प्रमुख कारण है कि वर्तमान सरकार पूंजीपतियों और उद्योगपतियों को बहुत प्रोत्साहित कर रही है, उद्योगों को सहायक मान रही है, शोषक नहीं।

अब भारत साम्यवादी अर्थनीति से बाहर निकलता जा रहा है। अब अडानी-अंबानी की अर्थनीति में सलाह ली जा रही है। एक जमाना था, जब टाटा और बिरला को गालियां दी जाती थीं और एक जमाना है, जब अडानी-अंबानी को सम्मान दिया जा रहा है। मैं मानता हूं, यह आदर्श स्थिति नहीं है, लेकिन नेहरू की अर्थव्यवस्था की तुलना में कई गुना अधिक अच्छी है।