बदलते समय के साथ नीतियां भी बदलनी चाहिए
20 अगस्त प्रातः कालीन सत्र। मेरा अपना निष्कर्ष है कि समय और परिस्थितियां बदलती रहती हैं। बदलते परिवेश में नीतियां भी बदली जानी चाहिए। जो समाज या राष्ट्र अपनी नीतियां नहीं बदलते हुए पुरानी लीक पर चलते रहते हैं, उन्हें बहुत नुकसान होता है। या तो उसके कारण एक विद्रोह पैदा होता है अथवा कुछ बिना सोची-समझी गलत नीतियां समाज में प्रचलित हो जाती हैं। इसलिए यह अच्छा होगा कि हम देश, काल और परिस्थिति के अनुसार अपनी नीतियों में संशोधन करें। सिद्धांत तो जल्दी नहीं बदलते हैं, लेकिन नीतियां बदली जा सकती हैं।
हम देख रहे हैं कि वर्तमान भारत सरकार महिलाओं और युवाओं के विषय में या तो गलत नीति पर चल रही है या पुरानी नीति पर चल रही है। अब नई परिस्थितियों में आप अनावश्यक सारे कानून हटा दीजिए। युवाओं और महिलाओं को भी समानता का अधिकार दीजिए। अब कानून की अधिकता समाज में अव्यवस्था पैदा कर रही है।
इसी तरह मेरा यह मानना है कि अब सामाजिक व्यवस्था को भी अपने अंदर बदलाव लाना चाहिए। अब बच्चों और महिलाओं को आश्रित नहीं, बल्कि समानता के अधिकार दिए जाने चाहिए। आप परिवार को एक इकाई बना लीजिए। सरकार और समाज परिवार के मामले में बनाए गए सारे कानून जल्दी से जल्दी हटा ले। मैं तो इस मत का हूं कि जितनी जल्दी सरकार और समाज पारिवारिक व्यवस्था को छूट दे देंगे, उतनी ही जल्दी समाज में अव्यवस्था और अराजकता दूर हो सकती है।
सरकार और समाज के लोग यदि नहीं बदल पा रहे हैं तो किनारे हो जाएं। हम सब लोग मिलकर इस नए बदलाव के लिए तैयार हैं।
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