महंगाई पर मीडिया के दावों की सच्चाई
आज सवेरे मैंने अखबारों में पढ़ा कि पिछले एक सप्ताह में ही भारत में शक्कर के दाम 50% तक बढ़ गए हैं। सिर्फ शक्कर ही नहीं, गेहूं, चावल, मक्का, खाद्य तेल—सब चीजों के भाव में एक सप्ताह में भारी वृद्धि हुई है। टीवी पर भी मैं आमतौर पर यही समाचार दोहराते हुए सुन रहा हूँ। विपक्षी दल के नेता भी लगातार इस बात को दोहरा रहे हैं।
लेकिन जब मैंने इस संबंध में खोज की तो यह पाया कि इस प्रकार के झूठे समाचार जानबूझकर फैलाए जा रहे हैं, क्योंकि ये सभी अखबार वाले और टीवी वाले पूंजीपतियों के आश्रित हैं। विपक्ष भी बड़े-बड़े पूंजीपतियों के पैसे से चलता है और इसलिए झूठ फैलाना इनकी मजबूरी बन गई है। आप पता कर लीजिए कि जिन चीजों के दाम बढ़े हैं, ये पिछले 7 दिनों में नहीं बढ़े हैं, बल्कि पिछले 7 वर्षों में बढ़े हैं। पिछले पांच-सात वर्ष पहले भी इन चीजों के वही मूल्य थे जो 7 दिन पहले थे। स्पष्ट है कि 7 दिनों में बढ़ोतरी का झूठ बोला जा रहा है; 7 वर्षों के बाद ये मूल्य बढ़ रहे हैं।
फिर दूसरी बात यह है कि यदि हम 70 वर्षों की जानकारी इकट्ठी करें, तो मैं आपको बता दूं कि मैंने स्वतंत्रता के पहले भी सब कुछ प्रत्यक्ष देखा है। 70 वर्ष पहले मजदूरी करीब 40 पैसे थी, एक शिक्षक का वेतन महीने में ₹40 मिलता था, उस समय गेहूं और चावल का रेट भी करीब-करीब 40 पैसे प्रति किलो के आसपास ही था।
अब आप 70 वर्षों के बाद आकलन करिए—मजदूरी 1000 गुना बढ़ गई है। अब 40 पैसे की जगह ₹400 मजदूरी हो गई है, तो मजदूरी बढ़ी है 1000 गुनी, शिक्षकों का वेतन बढ़ गया 2000 गुना, और गेहूं, चावल, मक्का और चीनी का भाव आज के भाव की तुलना में सिर्फ 100 गुना बढ़ा है।
क्या हमारे देश के ये मीडियाकर्मी इतना भी नहीं देख पा रहे हैं कि उस समय से आज चांदी और सोना कितने हजार गुना बढ़ा, मजदूरी कितनी बढ़ी, सरकारी कर्मचारियों का वेतन कितना बढ़ा, नेताओं की सुविधाएं कितनी बढ़ीं और बेचारे किसानों का गेहूं और चावल कितना बढ़ा? गेहूं, चावल, शक्कर उस समय की तुलना में आज मिट्टी के मोल हो गए हैं और हमारे देश के ये पूंजीपतियों के एजेंट इतने अंधे हो गए हैं कि ये झूठ पर झूठ फैला रहे हैं।
आप मेरे प्रश्न का उत्तर दीजिए कि 70 वर्षों में मजदूरी बढ़ी हजार गुनी और गेहूं-चावल का मूल्य बढ़ा 100 गुना, तो हम सरकार से पूछना चाहते हैं कि आपको क्या दिक्कत आ रही है कि आप पूरा एथेनॉल बनाना क्यों नहीं शुरू कर रहे हैं? आपको पूंजीपतियों से डर है, मीडिया से डर है, विपक्षी दलों से डर है, तो अलग बात है।
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