अब “अरावली संकट में है” के नाम पर पर्यावरणवादियों ने एक नई दुकानदारी शुरू कर दी है।
कहावत है कि दुकानदार अपना व्यापार चलाने के लिए किसी न किसी वस्तु को हमेशा हाईलाइट करता ही है—दुकानदारी कभी खतरे में नहीं पड़ती। वर्तमान समय में भी यही स्थिति दिखाई देती है। अब “अरावली संकट में है” के नाम पर पर्यावरणवादियों ने एक नई दुकानदारी शुरू कर दी है।
छत्तीसगढ़ में यह काम “जंगल बचाओ” के नाम पर किया गया, उत्तराखंड में “गंगा बचाओ” के नाम पर अभियान चलाया गया और अब राजस्थान में “अरावली पर्वत बचाओ” के नाम से वही कहानी दोहराई जा रही है। ये तथाकथित विकास-विरोधी लोग, जिन्हें अक्सर विदेशी एजेंट कहा जाता है, किसी भी प्रकार के विकास को आगे बढ़ने नहीं देते।
अमेरिका, चीन और रूस तेज़ी से विकास करते हैं, जबकि भारत को बार-बार पर्यावरण की दुहाई देकर रोका जाता है। ऐसा प्रतीत होता है मानो हम आज भी किसी मानसिक गुलामी में जी रहे हों—हम जंगल लगाएँ, हम पर्यावरण सुधारें, और तथाकथित ‘मालिक’ देश अमेरिका, रूस और चीन निर्बाध रूप से विकास करते रहें। यह स्थिति अब स्वीकार्य नहीं हो सकती।
अरावली बचाओ और जंगल बचाओ जैसे अभियानों की आड़ में सक्रिय विदेशी एजेंटों पर सरकार को सख्ती बरतनी चाहिए। भारत में “आंदोलनजीवी” अब एक संगठित वर्ग बन चुका है—खेती के नाम पर आंदोलन, जंगल के नाम पर आंदोलन, पहाड़ के नाम पर आंदोलन, पानी के नाम पर आंदोलन। जहाँ भी कोई आंदोलन शुरू होता है, इस समूह के पेशेवर लोग तुरंत वहाँ पहुँच जाते हैं।
अब समय आ गया है कि इन आंदोलनजीवियों को वास्तविक रोजगार से जोड़ा जाए। यदि इन्हें जेल में रखकर वहीं खेती जैसे श्रम कार्य कराए जाएँ, तो शायद यह समाज और देश—दोनों के लिए अधिक उपयोगी सिद्ध हो।
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