स्वतंत्रता के बाद भारत की जनसंख्या संरचना में परिवर्तन हिन्दू ,मुस्लिम

स्वतंत्रता के बाद भारत में लगभग हर 10–12 वर्षों में मुस्लिम आबादी में लगभग एक प्रतिशत की वृद्धि होती रही है, जबकि उसी अवधि में हिंदू आबादी में लगभग एक प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। इस प्रकार, स्वतंत्रता के समय जहाँ मुस्लिम आबादी लगभग 9% थी, वह वर्तमान में लगभग 15% के आसपास पहुँच गई है। इसी अनुपात में हिंदू आबादी में भी लगभग 6–7% की गिरावट आई है।
इन्हीं आँकड़ों के आधार पर अनेक विद्वानों ने यह भविष्यवाणी की कि आने वाले समय में मुस्लिम आबादी और भी तेज़ी से बढ़ेगी। मुंबई के संदर्भ में भी ऐसी भविष्यवाणियाँ की गई हैं कि वहाँ मुस्लिम आबादी शीघ्र ही 30% तक पहुँच सकती है। मैंने स्वयं भी इस विषय पर गंभीरता से विचार किया और पाया कि ये आँकड़े सही हैं, किंतु यह भी तथ्य है कि ये आँकड़े लगभग दो वर्ष पुराने हैं।
दो वर्ष पहले तक नेहरू परिवार की राजनीति इस दिशा में सक्रिय दिखाई देती थी कि हिंदू और मुस्लिम आबादी का अनुपात समान हो जाए। उस दिशा में उसे कुछ हद तक सफलता भी मिली। हिंदुओं की अधिक शादियों पर नियंत्रण लगाया गया, जबकि मुसलमानों को इसमें छूट दी गई। संतानोत्पत्ति के संदर्भ में भी मुसलमानों को प्रोत्साहन मिला। विभिन्न क्षेत्रों में उन्हें विशेष अधिकार दिए गए—शिक्षा के क्षेत्र में विशेष सुविधाएँ प्रदान की गईं। विदेशी मुसलमानों को भी भारत में दामाद की तरह सुविधाएँ और सम्मान दिए गए। इन सभी कारणों से देश में मुस्लिम आबादी लगातार बढ़ती चली गई और हिंदू आबादी घटती गई।
किन्तु यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि समय अब बदल चुका है। भारत में समान नागरिक संहिता की दिशा में कदम बढ़ रहे हैं। न्यायपालिका अब नेहरू परिवार के प्रभाव से धीरे-धीरे स्वतंत्र होती दिखाई दे रही है। देश के विभिन्न क्षेत्रों में संघ परिवार का प्रभाव बढ़ रहा है। बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुसलमानों को भारत से बाहर किया जा रहा है। मुसलमानों को दिए गए विशेष अधिकारों में कटौती हो रही है। अब भारत का हिंदू स्वयं को दूसरे दर्जे का नागरिक मानने के लिए विवश नहीं है।
अतः मैं भविष्यवाणी करने वालों से निवेदन करना चाहता हूँ कि दो वर्ष पूर्व की परिस्थितियों के आधार पर किए गए अनुमान अब वर्तमान परिस्थितियों से मेल नहीं खाते। सत्तर वर्षों तक जिन लाभों के कारण मुस्लिम समुदाय की आबादी बढ़ी, अब उसके परिणामों का सामना करने का समय आ रहा है। इसलिए अब हिंदुओं को चिंता करने की आवश्यकता नहीं है; बल्कि मुस्लिम समुदाय को इस विषय पर गंभीरता से विचार करना चाहिए—या तो समान नागरिक संहिता को स्वीकार करें, अथवा संभावित परिणामों के लिए तैयार रहें।