आधुनिक काल में जिस प्रकार “महिला सशक्तिकरण” की अवधारणा प्रस्तुत की गई है, वह हमारी पारंपरिक भारतीय सोच से भिन्न है।
हमारी भारतीय संस्कृति आज विभिन्न बाहरी सांस्कृतिक प्रभावों के दबाव का अनुभव कर रही है। कुछ लोग मानते हैं कि इन प्रभावों में इस्लामी और ईसाई सांस्कृतिक धाराओं का विशेष उल्लेख किया जा सकता है। उनके अनुसार, इन प्रभावों के प्रति हमारी प्रतिक्रिया एक-सी न होकर विवेकपूर्ण और अलग-अलग होनी चाहिए, ताकि भारतीय सामाजिक संतुलन बना रहे।
यह भी कहा जाता है कि आधुनिक काल में जिस प्रकार “महिला सशक्तिकरण” की अवधारणा प्रस्तुत की गई है, वह हमारी पारंपरिक भारतीय सोच से भिन्न है। भारतीय संस्कृति में स्त्री और पुरुष को मूलतः परस्पर पूरक और समान सम्मान का अधिकारी माना गया है, न कि एक-दूसरे के विरोधी के रूप में। इसके बावजूद, महिला सशक्तिकरण की कुछ व्याख्याओं ने समाज में नए प्रकार के तनाव और शंकाएँ उत्पन्न की हैं—विशेषकर पुरुष-महिला संबंधों को लेकर।
कुछ आलोचकों का मत है कि सीमित संख्या में कुछ प्रभावशाली और जागरूक वर्ग की महिलाओं द्वारा इस अवधारणा का राजनीतिक और कानूनी लाभ के लिए दुरुपयोग किया गया, जिसका दुष्प्रभाव सामान्य महिलाओं और सामाजिक संबंधों पर पड़ा। इसके परिणामस्वरूप, कार्यस्थलों और सामाजिक जीवन में परस्पर विश्वास में कमी और अनावश्यक भय की स्थिति उत्पन्न हुई है।
यह भी तर्क दिया जाता है कि भारतीय समाज में पारंपरिक रूप से स्त्री-पुरुष संबंध विभिन्न सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों में आपसी सहमति और सामाजिक ढाँचे के भीतर विकसित होते रहे हैं। किंतु वर्तमान समय में कुछ अतिरंजित विमर्शों के कारण संदेह और असुरक्षा की भावना बढ़ी है, जिससे सामान्य सामाजिक व्यवहार भी प्रभावित हो रहा है।
इस दृष्टिकोण के अनुसार, भारतीय संस्कृति को बाहरी प्रभावों के संदर्भ में आत्ममंथन करते हुए अपनी मूल संवेदनशीलता, संतुलन और आत्मविश्वास को सुरक्षित रखने की आवश्यकता है। महिलाओं को स्वभावतः कमजोर या सदा पीड़ित के रूप में प्रस्तुत करना भी इस सोच के अनुसार भारतीय सांस्कृतिक परंपरा से मेल नहीं खाता। आवश्यक है कि समाज में किसी भी विचारधारा या आंदोलन का मूल्यांकन संतुलित, तथ्यपरक और समग्र सामाजिक हित को ध्यान में रखकर किया जाए।
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