व्यवस्था परिवर्तन और व्यवस्था में सुधार—ये दोनों बातें अलग-अलग हैं।
16 जनवरी प्रातः कालीन सत्र।
हम नई समाज व्यवस्था पर चर्चा कर रहे हैं। व्यवस्था परिवर्तन और व्यवस्था में सुधार—ये दोनों बातें अलग-अलग हैं। वर्तमान स्थिति में हम व्यवस्था परिवर्तन पर ज़ोर दे रहे हैं क्योंकि हमारा यह मानना है कि अब एक नया वातावरण बन गया है, जिस वातावरण में हमें वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था से यह निवेदन करने की आवश्यकता महसूस हो रही है कि मुझे तुमसे कुछ भी न चाहिए, मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो।
अर्थात वर्तमान परिस्थितियाँ ऐसी हो गई हैं कि हम लोगों ने जिसे सुरक्षा का दायित्व दिया था, वही हमारी सबसे बड़ी समस्या बन गया है। कल्पना करिए कि हमने एक पहरेदार नियुक्त किया और वह पहरेदार ही हमारे ऊपर बोझ बन गया। हमने किसी व्यक्ति को छह महीने के लिए एक गाय की देखभाल की ज़िम्मेदारी सौंप दी और उस व्यक्ति ने गाय की कीमत से भी कई गुना अधिक खाने-पीने का बिल बना दिया।
हमने अपनी सरकार को सुरक्षा की ज़िम्मेदारी दी थी और सरकार हमसे जितना टैक्स ले रही है, उसमें से तीन-चौथाई सरकारी कर्मचारियों के वेतन और साज-सज्जा पर खर्च कर रही है और शेष एक-चौथाई हमें वापस कर रही है।
एक कहानी सुनी है कि किसी राजा ने किसी व्यक्ति को ₹1,00,000 दान देने की घोषणा की और वह व्यक्ति राजा के पास जाकर बोला कि यह ₹1,00,000 आप मुझे मत दीजिए, क्योंकि ₹1,00,000 से ज़्यादा तो आपके कर्मचारी लोग मुझसे घूस माँग रहे हैं।
ऐसी परिस्थिति आ गई है कि अब हम इस सरकार से यह कह रहे हैं कि भाई, हमने आपको कंबल समझा था, लेकिन आप तो भालू निकले। इसलिए मेरी जान बख्श दीजिए। मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए, मैं अपनी सुरक्षा खुद कर लूँगा।
इसे ही हम कहते हैं व्यवस्था परिवर्तन। इसलिए आइए, हम मिल-जुलकर सरकार से माँग करें कि मुझे तुमसे कुछ भी न चाहिए, मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो और मुझे स्वतंत्रता दे दो।
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