एक प्रसिद्ध विद्वान विपिन पब्बी का एक लेख पढ़ा। इस लेख में उन्होंने यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि

मैंने आज एक प्रसिद्ध विद्वान विपिन पब्बी का एक लेख पढ़ा। इस लेख में उन्होंने यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि बिना मुकदमा चलाए लंबे समय तक लोगों को जेल में बंद रखना एक प्रकार का अन्याय है। उनका मत है कि यदि मुकदमा शीघ्र प्रारंभ नहीं किया जा सकता, तो ऐसे लोगों को जेल से रिहा कर देना चाहिए। इस विचार का समर्थन पूर्व प्रधान न्यायाधीश जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़ ने भी किया है।
लेकिन जब मैंने इस विषय पर गहराई से विचार किया, तो मेरा मानना बना कि जितने निरपराध लोग वर्तमान समय में जेलों में बंद हैं, उसकी तुलना में कई गुना अधिक अपराधी ऐसे हैं जो जेल से छूटने के बाद बार-बार अपराध कर रहे हैं। यहाँ तक कि अनेक अपराधी जेल से एक प्रकार का प्रशिक्षण प्राप्त कर और भी गंभीर अपराध करने लगते हैं।
यहाँ एक मूल प्रश्न खड़ा होता है—क्या निरपराध व्यक्तियों का जेल में रहना अधिक गंभीर अपराध है, या फिर अपराधियों का जेल से छूटकर पुनः अपराध करना अधिक गंभीर समस्या है? किसी विद्वान लेखक या सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश को एकपक्षीय दृष्टिकोण रखने से बचना चाहिए। जन-प्रिय बातें लिखना आसान है, किंतु जनहित की बात लिखना कठिन और आवश्यक है।
यदि जेल से छूटा हुआ कोई अपराधी, जो जमानत पर बाहर आया है, कोई गंभीर अपराध करता है, तो इसके लिए न्यायपालिका को भी उत्तरदायी ठहराया जाना चाहिए। जस्टिस चंद्रचूड़ और विपिन पब्बी के सिद्धांत को तभी उचित कहा जा सकता है, जब समाज में सामान्यतः लोग अपराध-प्रवृत्ति की ओर नहीं बढ़ रहे हों। ऐसी स्थिति में लोगों को जेल में रखना अनावश्यक हो सकता है, क्योंकि सामान्य नागरिक शांतिप्रिय होते हैं।
किन्तु यदि समाज में अपराध लगातार बढ़ रहे हों, तो ऐसे समय में केवल इस सिद्धांत के आधार पर अपराधियों को जेल से छोड़ देना, मेरे विचार से, एक गलत और खतरनाक दृष्टिकोण है। इस दृष्टि से विपिन पब्बी का लेख मुझे संतुलित नहीं लगता।