रामानुजगंज शिविर: राज्य और समाज के बदलते शक्ति-संतुलन पर मंथन

24 फरवरी, प्रातःकालीन सत्र

पाँच दिनों के इस रामानुजगंज शिविर में हमने गंभीरतापूर्वक इस विषय पर चर्चा की कि राज्य निरंतर शक्तिशाली होता जा रहा है, जबकि समाज व्यवस्था अपेक्षाकृत कमजोर होती दिखाई दे रही है। विशेष बात यह है कि इस प्रक्रिया में राज्य न तो प्रत्यक्ष रूप से सेना की सहायता लेता है और न ही पुलिस बल का सहारा लेता है। फिर भी वह लगातार अधिक सशक्त कैसे होता जा रहा है—यह विचार का विषय है।

निश्चित रूप से राज्य ऐसा कोई न कोई तरीका अपनाता है, जिसके प्रभाव में आकर हम स्वयं उसके प्रभाव-जाल में फँस जाते हैं और प्रत्येक पाँच वर्ष में मतदान के माध्यम से अनजाने में उसी व्यवस्था को पुनः स्वीकृति दे देते हैं। प्रश्न यह है कि वह कौन-सा शब्दजाल है और वह कैसा मोहजाल है, जिसके प्रभाव में आकर समाज स्वयं को उसमें उलझा लेता है?

इसी विषय पर कई दिनों तक गहन मंथन हुआ और हम कुछ प्रारंभिक निष्कर्षों तक पहुँचे हैं। आगामी दस दिनों तक हम प्रातःकालीन सत्र में राज्य द्वारा अपनाए जाने वाले ऐसे ही विभिन्न “मोहजालों” पर प्रतिदिन चर्चा करेंगे, ताकि समाज इस विषय में सजग और सचेत हो सके।

समाज का निरंतर कमजोर होना और राज्य का अत्यधिक सशक्त हो जाना हमारी सामाजिक संतुलन व्यवस्था के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। इसी कारण हम कल से इस विषय पर एक सप्ताह की विशेष चर्चा-श्रृंखला प्रारंभ करेंगे।