लोकतंत्र में अराजकता का कारण और प्रश्न

30 मार्च, प्रातःकालीन सत्र।

कल मैंने यह विचार दिया था कि लोकतंत्र में अराजकता होती है; न कभी सुव्यवस्था होती है, न कु-व्यवस्था होती है। ऐसा क्यों होता है, यह भी एक गंभीर सवाल है। मैंने इस पर भी विचार किया है। तानाशाही में अराजकता का खतरा कभी होता ही नहीं है, क्योंकि व्यक्तिगत स्वतंत्रता नहीं होती। लोकतंत्र में व्यक्तिगत स्वतंत्रता असीम होती है। यह स्वतंत्रता उद्दंड न हो जाए, इसे रोकने की जिम्मेदारी सरकार की होती है, लेकिन सरकार सारा काम अपने ऊपर ले लेती है, जो वह कर नहीं पाती।

सरकार उद्दंडता को रोकने का कार्य तो करती ही है, साथ में आम लोगों की सुविधाओं का भी ख्याल रखने लगती है। आम नागरिकों का चरित्र-निर्माण भी सरकार करने लगती है। इस तरह सरकार समाज का भी काम अपने पास ले लेती है और धर्म का भी काम स्वयं करने लगती है। परिणाम यह होता है कि सरकार अपना मूल कार्य ठीक से नहीं कर पाती।

लोक-स्वराज में धर्म, समाज और राज्य अपने-अपने कार्य अपने-अपने तरीके से करते हैं। धर्म हृदय-परिवर्तन का कार्य करता है, समाज आम नागरिकों की आवश्यकताओं की पूर्ति करता है और राज्य सुरक्षा व न्याय तक सीमित रहता है। यही कारण है कि लोक-स्वराज में सुशासन होता है, जबकि लोकतंत्र में अराजकता होती है।

हम नई समाज-व्यवस्था में धर्म, समाज और राज्य—तीनों की अलग-अलग भूमिकाएँ सीमित कर देंगे, जिससे समाज में सुशासन स्थापित हो सके।