तमिलनाडु का विरोध: लाभ के बावजूद असहमति क्यों?
यह बात समझ में नहीं आई कि तमिलनाडु की सरकार ने इस आरक्षण विधेयक का विरोध किस समझ के आधार पर किया, क्योंकि इस विधेयक के अनुसार 2011 की जनगणना के आधार पर तमिलनाडु को 59 सीटें दी जा रही थीं, जो वर्तमान में 39 हैं। स्वाभाविक है कि देश के अनुसार ही तमिलनाडु में 20 सीटें बढ़ जातीं।
अब नए परिसीमन नई आबादी के आधार पर होगा, और उस आबादी के आधार पर तमिलनाडु की 39 सीटें घटकर 33 रह जाएंगी। यह समझ में नहीं आया कि राहुल गांधी ने तमिलनाडु के लोगों को भ्रमित किया, या जल्दबाजी में तमिलनाडु के नेता इस बात को समझ ही नहीं पाए। कारण क्या हुआ, पता नहीं, लेकिन मैं अभी तक नहीं समझ पाया कि दक्षिण भारत के लोगों ने इस संशोधन विधेयक का विरोध क्यों किया।
उत्तर भारत के लोगों ने विरोध किया, यह बात समझ में आती है, क्योंकि नई जनसंख्या के आधार पर उत्तर भारत की सीटें बढ़ जाएंगी और वे 2011 के आधार पर परिसीमन नहीं चाहते थे। लेकिन उत्तर भारत के साथ-साथ दक्षिण भारत का विरोध या तो मूर्खता माना जाए, या नासमझी, या जल्दबाजी, अथवा कहीं मेरे ही गणित में कोई फर्क है—यह भी समझ में आना चाहिए।
यही सोचकर मैंने यह पोस्ट लिखी है।
Comments