श्रमजीवियों के हित में नई सोच और दृष्टिकोण की आवश्यकता
कल 1 मई को श्रम शोषण दिवस माना जाता है, क्योंकि बहुत वर्ष पहले 1 मई को ही कुछ बुद्धिजीवियों ने शारीरिक श्रम और बौद्धिक श्रम को एक साथ जोड़कर शारीरिक श्रम का शोषण करना शुरू किया था। इसके पहले मुट्ठी भर पूंजीपति श्रम शोषण करते थे और बुद्धिजीवी श्रम शोषण से श्रमिकों की सुरक्षा करते थे, लेकिन 1 मई ही वह दिन है जब बुद्धिजीवियों ने श्रम शोषण को अपना अधिकार मान लिया और पूंजीपतियों के साथ समझौता कर लिया। 1 मई के बाद ही शारीरिक श्रम और बौद्धिक श्रम के बीच गहरी खाई बनी। बौद्धिक श्रम करने वालों का वेतन बहुत तेजी से बढ़ा और उन्होंने श्रम शोषण को अपना अधिकार मान लिया। अब शिक्षित बेरोजगारी भी बेरोजगारी की श्रेणी में शामिल हो गई है, जबकि शिक्षित लोग बुद्धिजीवी माने जाते हैं, श्रमजीवी नहीं। यही कारण है कि शारीरिक श्रम करने वाले लोग बुद्धिजीवियों और पूंजीपतियों द्वारा ठगे गए, और आज भी 1 मई के दिन ये बुद्धिजीवी उसकी वर्षगांठ मनाते हैं। मैं चाहता हूँ कि 1 मई को श्रमजीवियों के लिए कलंक दिवस घोषित किया जाए, क्योंकि यही 1 मई वह दिन है जिसने शारीरिक श्रम के शोषण का एकाधिकार बुद्धिजीवियों को प्रदान कर दिया।
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