विपक्ष की नई राह: सनातन, सामाजिक समीकरण और भाजपा की चुनौती
भारत के विपक्षी दलों की राजनीति में एक बड़ा बदलाव दिख रहा है। आज अरविंद केजरीवाल ने यह घोषित किया कि मैं पक्का सनातनी हूं। अखिलेश यादव भी धीरे-धीरे सनातनी बनते जा रहे हैं। अखिलेश यादव ने ब्राह्मण-यादव एकजुटता की नई राह पर चलने का निश्चय किया है। साथ ही अरविंद केजरीवाल और अखिलेश यादव ने राहुल गांधी से अलग रास्ता पकड़ते हुए योगी आदित्यनाथ के साथ कुछ संबंध सुधारने शुरू किए हैं। वैसे तो लोकसभा चुनाव के समय भी दोनों इस दिशा में नई राह शुरू कर चुके थे, लेकिन लोकसभा के बाद फिर से उन्होंने पुरानी राह पकड़ ली थी। पिछले एक-दो महीनों से अब दोनों आदित्यनाथ और नरेंद्र मोदी, अमित शाह के बीच खाई पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। उधर आदित्यनाथ जी के भी रुख में कुछ बदलाव दिख रहा है। जिस तरह अखिलेश यादव के पारिवारिक संकट में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने नया स्टैंड लेते हुए मदद की, वह भी एक नई राह का इशारा कर रही है। अरविंद केजरीवाल और अखिलेश यादव को यह पक्का विश्वास हो गया है कि अब हिंदुओं को बिना साथ लिए कोई भी राजनीतिक सफलता की संभावना नहीं है। इस दिशा में अरविंद केजरीवाल बहुत तेज गति से बढ़ना चाहते हैं, अखिलेश यादव धीरे-धीरे चलना चाहते हैं और राहुल गांधी अपने पुराने मार्ग पर चल रहे हैं। राम मंदिर में जो चढ़ावा चोरी हुई है, इस मुद्दे को बहुत अधिक व्यापक आधार देकर अखिलेश और अरविंद केजरीवाल लाभ उठाना चाहते हैं, लेकिन अखिलेश के सामने एक दिक्कत आ रही है कि जिस ब्राह्मण-यादव के गठजोड़ को अखिलेश बनाना चाहते हैं, इस राम मंदिर चोरी में अधिकांश उन्हीं लोगों के नाम सामने आ रहे हैं। फिर भी अखिलेश यादव और अरविंद केजरीवाल अब मुस्लिम-मुस्लिम की जगह हिंदू-हिंदू का राग अलापना शुरू कर रहे हैं और वह चाहते हैं कि नरेंद्र मोदी की जगह आदित्यनाथ को आगे बढ़ाया जाए, जबकि राहुल, प्रियंका नरेंद्र मोदी की जगह नितिन गडकरी पर दम लगाना चाहते हैं। लेकिन विपक्ष को यह पूरी तरह विश्वास हो गया है कि वर्तमान परिस्थितियों में भाजपा के अंदर टकराव के अलावा और कोई मार्ग नहीं है।
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