नई समाज व्यवस्था में लोकतंत्र का वैकल्पिक स्वरूप

14 जुलाई प्रातःकालीन सत्र। लोकतंत्र का जो नया संस्करण हम समाज के सामने रख रहे हैं, उसमें लोकतंत्र दो शब्दों को मिलाकर बनता है—लोक और तंत्र। हम लोकतंत्र की वर्तमान परिभाषा को गलत मानते हैं और लोकतंत्र की नई परिभाषा "लोक-नियंत्रित तंत्र" को विकसित कर रहे हैं।

इस परिभाषा के अनुसार लोक का मतलब समाज होगा और तंत्र का मतलब व्यवस्था। समाज का व्यवस्था पर संविधान के माध्यम से नियंत्रण होगा। इस तरह संविधान व्यवस्था से ऊपर होगा और समाज संविधान से ऊपर होगा।

तंत्र के भी दो भाग होंगे—एक समाज व्यवस्था और एक सुरक्षा व्यवस्था। सुरक्षा व्यवस्था के लिए हम एक सरकार बनाएंगे, जैसी वर्तमान में बनी हुई है। सुरक्षा को छोड़कर अन्य सभी कार्यों के लिए हम एक समाज व्यवस्था बनाएंगे, जो परिवार से लेकर संघ सभा तक जाएगी। इस तरह सारे कार्य विभाजित होंगे।

प्रदेशों की जगह संघ सभा के पास अधिकार होंगे। हम संघ सभा को लोकसभा से भी अधिक वरीयता देंगे, क्योंकि संघ सभा अधिक महत्वपूर्ण होगी। लेकिन लोकसभा भी हमारी सुरक्षा के लिए जिम्मेदार है, इसलिए शक्ति लोकसभा के पास अधिक होगी।

दोनों ही सभाएँ संविधान से संचालित होंगी और संविधान लोक अर्थात समाज द्वारा बनाई गई एक अलग इकाई तैयार करेगा। ऐसी इकाई को ही हम संविधान सभा कहेंगे।

स्पष्ट है कि हमारे आदर्श लोकतंत्र में आपको सब कुछ सुधरा हुआ नज़र आएगा।