राहुल गांधी के सामने सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती
राहुल गांधी ने आज एक गंभीर टिप्पणी की है कि भारत की शिक्षा व्यवस्था पर संघ के लोगों का एकाधिकार हो गया है। अन्य विपक्षी दल भी हमेशा इस प्रकार की बात कहते रहे हैं कि हर लोकतांत्रिक संस्था में संघ के लोगों की ताकत लगातार बढ़ती जा रही है। मेरे विचार से यह बात बिल्कुल सच भी है। अब तो संसद में भी संघ की शक्ति जल्दी ही दो-तिहाई तक हो सकती है।
यह बात सच होते हुए भी विचारणीय प्रश्न यह है कि ऐसा क्यों है। जब तक इसके कारणों पर राहुल गांधी और विपक्ष विचार नहीं करता, तब तक जनता को यह सूचना देने का कोई परिणाम नहीं निकलेगा कि संघ की ताकत बढ़ती जा रही है। आपके छाती पीटने से राजनीति पर कोई बड़ा प्रभाव पड़ने वाला नहीं है। इसलिए इस पर गंभीरता से विचार कीजिए।
मैं इस बात को समझ रहा हूँ कि विपक्ष की राजनीति सिर्फ इस बात पर टिकी हुई थी कि गांधी और सावरकर के बीच दिन-रात झगड़ा कर उसका आनंद विपक्ष लेता रहे। लेकिन जब से गांधी और सावरकर के बीच समझौता हो गया है, तब से संघ की ताकत लगातार बढ़ रही है और विपक्ष कमजोर होता जा रहा है।
राहुल गांधी को यह बात तय करनी होगी कि वह मुसलमानों और कम्युनिस्टों—इन दोनों के ही भरोसे राजनीति करना चाहते हैं अथवा हिंदुओं और दक्षिणपंथी विचारधारा के लोगों को भी अपने साथ जोड़कर चलने की सोच रहे हैं। अब यह निर्णय राहुल गांधी के ऊपर निर्भर करता है कि वह संघ को गाली देकर अपने को समाप्त करना चाहते हैं अथवा अपनी नीतियों में बदलाव करके भारत की राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखना चाहते हैं।
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