हम नई समाज व्यवस्था में बेरोजगारी की वर्तमान परिभाषा को पूरी तरह बदल देंगे।

28 जनवरी, प्रातःकालीन सत्र
हम नई समाज व्यवस्था में बेरोजगारी की वर्तमान परिभाषा को पूरी तरह बदल देंगे। हमारे आधार पर बेरोजगारी की परिभाषा यह होगी—योग्यता के अनुसार कार्य और न्यूनतम घोषित वेतन की गारंटी।
इसका अर्थ यह है कि हम वेतन की गारंटी प्रत्येक व्यक्ति के लिए समान रूप से घोषित करेंगे। हम यह भी स्पष्ट करेंगे कि कोई भी व्यक्ति बेरोजगार नहीं रहेगा—चाहे वह विकलांग हो, गरीब हो, श्रमजीवी हो या डॉक्टर हो। वेतन सभी को समान मिलेगा और कार्य उसकी योग्यता के अनुसार दिया जाएगा।
व्यक्ति को कार्य करने की पूर्ण स्वतंत्रता होगी। वह जब तक चाहे, तब तक कार्य कर सकता है और चाहे तो किसी भी समय कार्य छोड़ सकता है। भारत के वर्तमान वातावरण में न्यूनतम घोषित श्रम-मूल्य ₹300 प्रतिदिन हो सकता है, लेकिन मेरे विचार से इसे ₹400 प्रतिदिन रखना अधिक उपयुक्त होगा।
इस बेरोजगारी की परिभाषा में धर्म, जाति और लिंग का कोई भेद नहीं होगा। प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह गारंटी समान रूप से लागू होगी। इस प्रकार हम एक ही दिन में भारत को बेरोजगारी-मुक्त घोषित कर सकते हैं।
कोई भी व्यक्ति भूखा नहीं रहेगा, क्योंकि हर व्यक्ति को न्यूनतम मजदूरी की गारंटी होगी और वर्ष भर काम उपलब्ध रहेगा। वर्तमान में बेरोजगारी की जो परिभाषा प्रचलित है, वह गलत है और उसे बदला जाएगा। दुनिया भर में बेरोजगारी की यह गलत परिभाषा अनेक प्रकार के भ्रम और टकराव पैदा करती है।
हमारी व्यवस्था में कोई भी व्यक्ति अपनी योग्यता के अनुसार, घोषित वेतन पर, कहीं भी कार्य करने के लिए पूर्णतः स्वतंत्र होगा।
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