एआई, प्रकृति और बदलती सामाजिक व्यवस्था का संकेत

जिस तरह प्रकृति अपना काम कर रही है, उसी तरह उसने कोरोना काल में भी अपने तरीके से कार्य किया। वर्तमान युद्ध में भी प्रकृति ने अपने तरीके से कुछ काम शुरू किया है। प्रकृति ने ही एआई के माध्यम से भी समाज के सामने कुछ नई योजनाएँ रखी हैं। ये सभी योजनाएँ प्रकृति की ही देन हैं, किसी व्यक्ति की नहीं।

अभी-अभी दो दिन पहले दो पति-पत्नी इंजीनियरों ने इसलिए आत्महत्या कर ली कि उनकी नौकरी छूट गई थी। यह नौकरी छूटने का कार्य एआई ने किया, और एआई को सक्रिय करने का कार्य प्रकृति कर रही है। जो बुद्धिजीवी श्रम को बेरोजगार करके अपने वेतन-भत्ते बढ़ा रहे थे, अपने पास सारी सुविधाएँ इकट्ठा कर रहे थे, उन्हें प्रकृति ने अब बेरोजगार करना शुरू कर दिया है।

प्रकृति मानो उन्हें यह संदेश दे रही है कि जाओ, श्रम का सम्मान करो। श्रम-शोषण के माध्यम से सारी सुविधाएँ लूटकर तुम जो तरक्की करना चाहते हो, उसमें आत्महत्या के अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं बचेगा। इसलिए एआई की चुनौती बुद्धिजीवियों को स्वीकार करनी चाहिए। श्रम और बुद्धि के बीच जो बढ़ी हुई दूरी है, उसे घटने दीजिए। श्रम का सम्मान कीजिए, अन्यथा परिस्थितियाँ गंभीर होती जाएँगी।