गांधी की अहिंसा और बढ़ती सामाजिक हिंसा पर पुनर्विचार

22 में प्रातःकालीन सत्र।

हम समाज में बढ़ती हुई हिंसा का कारण समझते हैं और उसका समाधान भी समझ रहे हैं। वर्तमान समय में समाज में जो बढ़ी हुई हिंसा दिखाई दे रही है, उसके प्रमुख कारणों में से एक गांधी की अहिंसा का विकृत प्रचार है। गांधी की अहिंसा समाज में होनी चाहिए, इस बात से मैं पूरी तरह सहमत हूँ, लेकिन राज्य को या तो समुचित हिंसा करनी चाहिए या अधिक कठोरता दिखानी चाहिए। राज्य को न्यूनतम हिंसा की नीति नहीं अपनानी चाहिए।

या तो गांधी ने गलत कहा, या उनके कथन को गलत प्रस्तुत किया गया। कारण चाहे जो भी हो, लेकिन राज्य द्वारा न्यूनतम हिंसा का सिद्धांत अपनाए जाने के कारण समाज में असुरक्षा का भाव पैदा हुआ और समाज अपनी सुरक्षा के लिए स्वयं हिंसा का मार्ग अपनाने लगा। Vinayak Damodar Savarkar और Subhas Chandra Bose ने इस विचारधारा को और अधिक सशक्त किया।

इसका समाधान यही हो सकता है कि राज्य सबकी सुरक्षा की गारंटी दे। राज्य अपराधियों पर अधिकतम बल प्रयोग करे। मानवाधिकारवाद और जेल सुधारवाद जैसे विचार व्यवहारिक स्तर पर पर्याप्त समाधान नहीं दे पा रहे हैं। राज्य को इन सबसे मुक्त होकर कठोर दंड की व्यवस्था करनी चाहिए। शीघ्र न्याय और कठोर दंड ही समाज में अहिंसा के वास्तविक प्रचारक हो सकते हैं।

हम नई व्यवस्था में कठोर दंड की व्यवस्था करेंगे। आवश्यकता पड़ने पर अल्पकाल के लिए फाँसी की संख्या भी बढ़ाई जा सकती है। अपराधियों के मन में भय उत्पन्न होना चाहिए और राज्य को ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए जिससे समाज में सुरक्षा की भावना मजबूत हो। हम न्यूनतम हिंसा के गांधीवादी दृष्टिकोण के स्थान पर अधिक व्यवहारिक और सुरक्षा-केंद्रित नीति अपनाने की बात करते हैं।

हम हमेशा इस बात पर विचार करते हैं कि सिद्धांत और व्यवहार के तालमेल से ही नीति बननी चाहिए और नीति के अनुसार ही क्रियान्वयन होना चाहिए। अत्यधिक सिद्धांतवादी दृष्टिकोण और अति-व्यावहारिक दृष्टिकोण — दोनों ही अतिवादी होते हैं और दोनों ही गलत हो सकते हैं। इसलिए जीवन में “सर्वश्रेष्ठ संभव” के आधार पर नीति बननी चाहिए।

जो लोग बहुत ऊँचे सिद्धांतों के आधार पर नीति बनाते हैं, वे कई बार वास्तविक जीवन से कट जाते हैं। वहीं जो लोग अत्यधिक व्यवहारवादी नीति अपनाते हैं, वे आर्थिक रूप से संपन्न होकर भी समाज के लिए बोझ बन सकते हैं। इसलिए “बेस्ट पॉसिबल” सिद्धांत को सबसे अच्छा माना जा सकता है। इसका सीधा अर्थ यह है कि हम सर्वश्रेष्ठ के लिए प्रयत्न करें, उस प्रयत्न में अपनी पूरी शक्ति लगा दें, लेकिन जो परिणाम प्राप्त हो, उससे संतुष्ट रहें। किसी भी स्थिति में परिणाम से अत्यधिक असंतुष्ट न होना ही सबसे अच्छा सिद्धांत है।