मोहन भागवत जी से असहमति: लोकतंत्र में विपक्ष अनिवार्य क्यों हो?
आज संघ प्रमुख मोहन भागवत जी ने यह बात कही है कि लोकतंत्र में विपक्ष का होना आवश्यक है। मैं भागवत जी की इस बात से सहमत नहीं हूं। लोकतंत्र आदर्श भी होता है और विकृत भी होता है। विकृत लोकतंत्र वह होता है, जो पश्चिम की परिभाषा होती है—फॉर द पीपल, ऑफ द पीपल, बाय द पीपल। इसे विकृत लोकतंत्र कहा जाता है। आदर्श लोकतंत्र में लोक-नियंत्रित तंत्र ही उसकी परिभाषा होती है, जो हम भारत में मानते हैं, भले ही अब तक नहीं है।
विकृत लोकतंत्र में पक्ष और विपक्ष होता है। आदर्श लोकतंत्र में सब कुछ निष्पक्ष होता है। पक्ष-विपक्ष होता ही नहीं है। सबसे अच्छी बात यह है कि कोई भी निर्णय सर्वसम्मति से होना अधिक अच्छा है, अन्यथा निर्णय करने वाले सबको पूरी स्वतंत्रता से अपनी बात रखने की छूट होनी चाहिए।
मैं जानना चाहता हूं कि यह कैसा लोकतंत्र है, जहां संसद में भी अपनी बात बोलने की स्वतंत्रता नहीं होती। यह तो पक्ष और विपक्ष की गुलामी है, जहां हमारे चुने हुए व्यक्ति भेड़-बकरी के समान हाथ उठाने के लिए बाध्य हैं।
मैं भागवत जी से निवेदन करता हूं कि वह आदर्श लोकतंत्र की परिभाषा को समझें। अब भारत विकृत लोकतंत्र को लोकतंत्र नहीं समझे। हमें पक्ष-विपक्ष अनिवार्य नहीं, बल्कि मिल-जुलकर आपसी सहमति से निर्णय करने का प्रयास करना चाहिए। जब परिवार में पक्ष-विपक्ष नहीं होता, ग्राम सभा में पक्ष-विपक्ष नहीं होता, तब संसद में पक्ष-विपक्ष की क्या जरूरत?
Comments