एक परिवार ने अपनी छोटी बच्ची को दूसरे परिवार को दे दिया और बदले में उसे 35,000 रुपये मिले।
कल मैंने एक लेख लिखा था, जिसमें यह उल्लेख था कि एक परिवार ने अपनी छोटी बच्ची को दूसरे परिवार को दे दिया और बदले में उसे 35,000 रुपये मिले। इस लेन–देन को मैंने किसी प्रकार का अपराध नहीं बताया था, लेकिन मेरा लेख पढ़ते ही अनेक मानवतावादी और तथाकथित दयालु लोग आलोचना करने सामने आ गए।
आज फिर एक नया समाचार सामने आया है, जिसके अनुसार एक तलाकशुदा महिला ने अपने चार वर्षीय बच्चे की गर्दन दबाकर हत्या कर दी और उसे आत्महत्या सिद्ध करने का प्रयास किया। इस घटना के बाद फिर से सरकारी अधिकारी और तथाकथित मानवाधिकारवादी उस महिला को अपराधी सिद्ध करने में लग गए हैं।
मैं यह समझ नहीं पा रहा हूँ कि यदि वह महिला उस बच्चे से मुक्त होना चाहती थी, तो उसके पास क्या विकल्प थे। वह बच्चे को किसी को दे नहीं सकती, उसे घर से निकाल नहीं सकती, और वह बच्चे को अपने संभावित नए विवाह में बाधा मानती थी। ऐसी परिस्थिति में क्या वह जीवन भर घुट-घुट कर जीने को विवश थी?
जो लोग बच्चे को देने या बेचने की आलोचना कर रहे हैं, वे यह भी बताएं कि उस महिला के सामने वास्तविक विकल्प क्या था। यदि किसी अविवाहित लड़की को संतान हो जाती है, तो वह उस संतान के साथ क्या करे? समाज उसके सामने कौन सा मार्ग खोलता है? राज्य उसे कौन से व्यावहारिक विकल्प देता है?
आप इस प्रकार अनावश्यक सामाजिक बंधन बनाकर किसी के पूरे जीवन को बर्बाद नहीं कर सकते। कितने विचित्र और अव्यावहारिक कानून बना दिए गए हैं—एक महिला यदि किसी के साथ नहीं रहना चाहती, तो उसे तलाक के लिए भी अदालत की अनुमति लेनी पड़ती है। यह तर्क समझ से परे है।
इसलिए मानवाधिकार के ठेकेदारों को यह उत्तर देना चाहिए कि जिस महिला ने अपने चार साल के बच्चे की हत्या की, उसके सामने समाज ने कौन सा वास्तविक विकल्प रखा था। सामाजिक व्यवस्था केवल नैतिकता का उपदेश देने के लिए नहीं होती, बल्कि लोगों को व्यवहारिक विकल्प देने के लिए होती है।
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