चरित्रहीन लेकिन अधिकारविहीन व्यक्ति, चरित्रहीन और अधिकार-संपन्न व्यक्ति की तुलना में कम घातक होता है।
25 जनवरी, प्रातःकालीन सत्र
हम लोग प्रतिदिन प्रातःकाल किसी एक गंभीर समस्या पर चिंतन करते हैं—उसके कारणों की खोज करते हैं और उसके समाधान भी प्रस्तुत करते हैं।
वर्तमान विश्व में जो समस्याएँ निरंतर बढ़ती जा रही हैं, उनका प्रमुख कारण यह है कि हम लोग एक सैद्धांतिक भूल कर रहे हैं।
मानव समाज का एक मूल सिद्धांत है कि चरित्रहीन लेकिन अधिकारविहीन व्यक्ति, चरित्रहीन और अधिकार-संपन्न व्यक्ति की तुलना में कम घातक होता है।
दुर्भाग्यवश, दुनिया की राजनीतिक व्यवस्थाओं में ठीक इसका उलटा किया गया—पहले अधिकारों को एक जगह इकट्ठा कर दिया गया और फिर उनके लिए चरित्र की खोज शुरू कर दी गई। यह प्रक्रिया पूरी तरह गलत है।
मुझे तो लगता है कि इसमें कहीं न कहीं कोई षड्यंत्र भी रहा होगा, क्योंकि यह व्यवस्था सैद्धांतिक रूप से ही त्रुटिपूर्ण है।
इसे एक उदाहरण से समझिए—
यदि आप सड़क पर एक क्विंटल मिठाई रख दें और यह घोषणा कर दें कि लोग ईमानदारी से थोड़ी-थोड़ी मिठाई ले जाएँ, तो क्या होगा?
आप देखेंगे कि शक्तिशाली लोग अधिक से अधिक मिठाई ले जाएंगे और जो शरीफ या कमजोर होंगे, उन्हें मिठाई तो दूर, मार भी खानी पड़ सकती है।
अब गलती किसकी है?
अनेक नासमझ लोग कहते हैं कि “हमें सत्ता में चरित्रवान लोगों को भेजना चाहिए।”
अरे भाई, अगर सोचने की क्षमता नहीं है तो बोलना क्यों आवश्यक है?
क्या यह अधिक उचित नहीं होगा कि चरित्रवानों को सत्ता में भेजने की अपेक्षा सत्ता का ही विकेंद्रीकरण कर दिया जाए?
यदि सत्ता और चरित्र दोनों सबके पास थोड़ी-थोड़ी मात्रा में होंगे, तो कोई बड़ी समस्या उत्पन्न नहीं होगी।
लेकिन जब सत्ता एकत्रित होगी, तो चरित्रवान लोग या तो बाहर कर दिए जाएंगे या स्वयं हट जाएंगे, और गुंडा तत्व वहाँ हावी हो जाएंगे—जैसा कि वर्तमान समय में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है।
और तब मूर्ख लोग फिर चरित्र की दुहाई देते रहेंगे।
सच्चाई यह है कि जब तक सत्ता का विकेंद्रीकरण नहीं होगा, तब तक चरित्रवान व्यक्ति सत्ता में पहुँच ही नहीं सकता।
इसलिए हमें “व्यवस्था परिवर्तन” का नारा देना होगा।
हमें समाज में इस बात की जन-जागृति करनी होगी कि सत्ता का एकत्रीकरण घातक है, सत्ता का विकेंद्रीकरण आवश्यक है, और यदि संभव हो तो अधिकेंद्रण (Decentralization से आगे) और भी अधिक हितकारी होगा।
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