लोकतंत्र और तानाशाही में सुशासन की वास्तविकता
29 मार्च प्रातःकालीन सत्र। भारत सहित दुनिया के सभी देश सुशासन की गारंटी देते हैं, लेकिन सुशासन मिल पाता है या नहीं, यह उस देश के नागरिक ही जानते हैं। भारत को भी स्वतंत्रता के बाद सुशासन की ही गारंटी दी गई थी, लेकिन भारत के लोग जानते हैं कि सुशासन किसे कहते हैं। मेरे विचार में लोकतंत्र में सुशासन आता ही नहीं है और यदि कहीं सुशासन आता भी है, तो अल्पकाल के बाद जनता सुशासन का अनुभव करना बंद कर देती है। तानाशाही में या तो सुशासन आता है या कुशासन आता है, लेकिन कुशासन को भी जनता सुशासन समझना शुरू कर देती है क्योंकि जनता को तानाशाह का डर होता है। यही अंतर है लोकतंत्र और तानाशाही के बीच। मेरा अपना अनुभव यह कहता है कि सुशासन सिर्फ स्वशासन से ही आ सकता है और सुशासन का कोई उपाय नहीं है, क्योंकि सुशासन आने की अपेक्षा सुशासन का अनुभव होना अधिक महत्वपूर्ण है। जब स्वशासन होगा, तो सुशासन या कुशासन की बात ही समाप्त हो जाएगी और व्यक्ति गलत-सही के लिए स्वयं को जिम्मेदार मानना शुरू कर देगा। इसलिए मैं यह सुझाव देता हूँ कि सुशासन का नारा केवल भ्रम है; सुशासन नहीं, स्वशासन की आवाज उठानी चाहिए।
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