जातिवाद के बढ़ते प्रभाव और सर्वजातीय एकता की चुनौती

मैंने कल जातिवाद पर चर्चा की थी। मेरा यह मानना है कि वर्तमान समय में नक्सलवाद और मुस्लिम सांप्रदायिकता के निपट जाने के बाद जातिवादी संस्थाएँ बहुत तेजी से मुखर हो रही हैं। अब जातिवाद पूरी राजनीति पर नियंत्रण करना चाहता है।

जातिवाद धीरे-धीरे लंबे समय से बढ़ रहा था और ब्राह्मणों की भूमिका उसमें बहुत कम थी, लेकिन पिछले कुछ दिनों से ब्राह्मण इस मामले में बहुत अधिक बढ़-चढ़कर भाग ले रहे हैं।

जातिवाद के विरुद्ध सर्वजातीय अभियान आर्य समाज, गायत्री परिवार, गांधीवादी, संघ परिवार, माँ संस्थान जैसी संस्थाएँ चलाती रही हैं। हम लोग भी लगातार सर्वजातीय समूह को महत्व देते रहे, लेकिन जब से इस्लाम कमजोर हुआ है और जातिवाद मजबूत हुआ है, तब से अब हम लोगों की भी हिम्मत कमजोर हो गई है।

हम जातिवाद को रोकने में समर्थ नहीं हो रहे हैं, क्योंकि राजनीति पूरी तरह जातिवाद के सहारे चल रही है। कानून और संविधान भी जातिवाद को प्रसार दे रहे हैं। ऐसे वातावरण में मुझे यह सही दिखता है कि हम अब जातिवाद का विरोध करना बंद कर दें, जातियों को आपस में कटने-मरने दें, लड़ने-झगड़ने दें और हम सब लोग मिलकर सर्वजातीय समूह को मजबूत करते चलें।

क्योंकि मेरे विचार से हम जातिवाद को अब अपनी ताकत लगाकर रोक नहीं सकेंगे। इसलिए मेरा यही विचार है कि हम सर्वजातीय समूह को सशक्त करते चलें। संघ, आर्य समाज, गायत्री परिवार और गांधीवादी मिलकर सर्वजातीय समूह को मजबूत करें। यही एकमात्र मार्ग दिखता है।