राज्य, अपराध और दंड व्यवस्था की विसंगतियाँ
11 मार्च, प्रातःकालीन सत्र
राज्य समाज को गुलाम बनाकर रखने के लिए तरह-तरह के नाटक करता है। उन नाटकों में एक महत्वपूर्ण नाटक यह होता है कि राज्य खूंखार अपराधियों का हृदय परिवर्तन करने का प्रयास करता है और साधारण अपराधियों को जेल में बंद कर देता है।
आप देख रहे होंगे कि किस प्रकार जेलों को सुधार गृह बनाया जा रहा है। जेलों में लोगों को हर प्रकार की सुविधाएँ दी जा रही हैं, जबकि बाहर रहने वाले अनेक लोगों को उतनी सुविधाएँ भी उपलब्ध नहीं हैं जितनी जेलों में मिल रही हैं। जेलों में प्रवचन कराए जाते हैं, ताकि कैदियों का हृदय परिवर्तन हो सके।
दूसरी ओर, गांजा, अफीम, शराब, जुआ, दहेज और आदिवासी एक्ट जैसे अनेक मामलों में लोगों को लंबे समय तक जेलों में बंद रखा जाता है। बलात्कार के मामले में फाँसी की सजा दी जाती है, जबकि हत्या के मामले में आजीवन कारावास का दंड दिया जाता है। यह एक विचित्र प्रकार की कानूनी व्यवस्था प्रतीत होती है।
वास्तव में सामाजिक समस्याओं का समाधान सामाजिक स्तर पर होना चाहिए। प्रशासनिक अपराधों का दंड प्रशासनिक होना चाहिए, और आर्थिक मामलों का समाधान आर्थिक रूप से किया जाना चाहिए। लेकिन सरकार अक्सर आर्थिक मामलों का भी प्रशासनिक समाधान करती है। इस प्रकार सरकार के अनेक नियम उल्टे ढंग से चलते दिखाई देते हैं।
इसलिए अब समय आ गया है कि अपराधियों के साथ कठोरता का व्यवहार किया जाए। जेलों को दंड-गृह बनाया जाए, केवल सुधार-गृह नहीं। नई व्यवस्था में अपराध, गैर-कानूनी कार्य और अनैतिक आचरण को अलग-अलग श्रेणियों में बाँटना चाहिए। अपराधियों को कठोर दंड दिया जाए, गैर-कानूनी कार्य करने वालों पर आर्थिक दंड लगाया जाए, और अनैतिक कार्य करने वालों को सामाजिक दंड दिया जाए।
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