मैं आज प्रातःकाल से समाज-सशक्तिकरण के प्रश्न पर विचार कर रहा हूँ।
मैं आज प्रातःकाल से समाज-सशक्तिकरण के प्रश्न पर विचार कर रहा हूँ। हाल ही में नीतीश कुमार द्वारा एक महिला डॉक्टर का हिजाब हटवाने की घटना सामने आई। यह कार्य सही था या गलत—इस पर मैं यहाँ चर्चा नहीं कर रहा हूँ। मेरा ध्यान इस बात पर है कि इस विषय के विरोध में देशभर के अधिकांश मुसलमान सक्रिय हो गए, यहाँ तक कि पाकिस्तान तक से प्रतिक्रियाएँ आने लगीं। प्रश्न यह है कि क्या यह मामला केवल इस्लाम तक ही सीमित था?
इसी प्रकार, आज ही न्यूज़ीलैंड में सिख समुदाय के एक जुलूस को वहाँ के कुछ कट्टरपंथी ईसाइयों ने रोक दिया। उनका कहना था कि न्यूज़ीलैंड में किसी भी धर्म के लोगों को खुलेआम हथियार लेकर चलने की अनुमति नहीं है। हथियारों का सार्वजनिक प्रदर्शन वहाँ की सामाजिक व्यवस्था के अनुरूप नहीं है। यह न्यूज़ीलैंड है, भारत नहीं। इस घटना पर भारत के कई सिख नेताओं ने तुरंत प्रतिक्रिया दी और कुछ ने तो प्रधानमंत्री को पत्र भी लिखा। यहाँ भी प्रश्न उठता है—क्या यह मामला केवल सिख समुदाय से जुड़ा हुआ था?
असल में, मूल प्रश्न यह है कि क्या हथियार लेकर चलना सामाजिक व्यवस्था का एक आवश्यक अंग है? क्या हिजाब पहनना सामाजिक व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा माना जाना चाहिए? और यदि व्यवस्था के भीतर रहकर हिजाब या हथियार—दोनों का दुरुपयोग किया जाता है, तो उस पर प्रश्न उठाने वालों को पूरी तरह गलत कैसे कहा जा सकता है?
मैं यह मानता हूँ कि ऐसी घटनाओं से मुसलमानों और सिखों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचती है। किंतु साथ ही यह भी आवश्यक है कि ये दोनों समुदाय सामाजिक भावनाओं, सामाजिक नियमों और जिस देश में वे रह रहे हैं वहाँ की व्यवस्था का भी गंभीरता से ध्यान रखें। समाज केवल किसी एक समुदाय की भावनाओं से नहीं, बल्कि सामूहिक समझ और संतुलन से चलता है।
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