राज्य, राष्ट्र और समाज : पुनर्परिभाषा की आवश्यकता

1 जनवरी 2026 : प्रातःकालीन सत्र
राज्य, राष्ट्र और समाज : पुनर्परिभाषा की आवश्यकता
कल रात्रि 7:30 बजे से 9:30 बजे तक देश के विभिन्न हिस्सों से जुड़े कई प्रमुख व्यक्तियों ने एक गंभीर वैचारिक बैठक में भाग लिया। इस बैठक का केंद्रीय विषय था—वर्तमान विश्व में राज्य, राष्ट्र और समाज की प्रचलित परिभाषाएँ तथा उनकी वास्तविक भूमिका।
विस्तृत विचार-विमर्श के उपरांत यह स्पष्ट हुआ कि इस विषय पर कोई सर्वसम्मति नहीं बन सकी। अधिकांश प्रतिभागियों की यह धारणा उभरकर सामने आई कि या तो आज के समय में इन तीनों की अलग-अलग स्पष्ट परिभाषाएँ मौजूद नहीं हैं, अथवा यदि हैं भी, तो वे व्यवहारिक रूप से त्रुटिपूर्ण हैं।
1. राज्य, राष्ट्र और समाज की अलग-अलग पहचान
मेरा स्पष्ट मत है कि वर्तमान समय में राज्य, राष्ट्र और समाज—तीनों की स्पष्ट, पृथक और सीमाबद्ध परिभाषाएँ निर्धारित की जानी चाहिए।
• राज्य और राष्ट्र की भौगोलिक सीमा एक मानी जा सकती है।
उदाहरणतः भारत एक राष्ट्र है और भारत एक राज्य भी है।
• किंतु इन तीनों की भूमिका, दायित्व और कर्तव्य पूर्णतः अलग-अलग होने चाहिए।
2. अधिकारों का स्पष्ट विभाजन
बैठक में यह स्वीकार किया गया कि व्यक्ति और नागरिक के जीवन से जुड़े अधिकार मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं—
1. मौलिक अधिकार
2. संवैधानिक अधिकार
3. सामाजिक अधिकार
इन तीनों अधिकारों की सुरक्षा की जिम्मेदारी अलग-अलग इकाइयों को दी जानी चाहिए—
• राज्य (तंत्र)
o केवल और केवल मौलिक अधिकारों की सुरक्षा की गारंटी दे
o इसके अतिरिक्त राज्य की कोई अन्य भूमिका न हो
• संवैधानिक इकाई (जिसे वर्तमान में राष्ट्र कहा जाता है)
o संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा की गारंटी दे
o यह इकाई संविधान से संचालित हो
• समाज
o प्रत्येक व्यक्ति और नागरिक के सामाजिक अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करे
इस प्रकार—
मौलिक अधिकार — राज्य
संवैधानिक अधिकार — अलग संवैधानिक इकाई
सामाजिक अधिकार — समाज
3. वर्तमान समस्या
वर्तमान समय में राज्य, राष्ट्र और समाज—तीनों एकाकार हो चुके हैं।
राज्य ने स्वयं को राष्ट्र भी घोषित कर लिया है और समाज भी।
यह स्थिति न तो वैचारिक रूप से उचित है और न ही व्यावहारिक रूप से न्यायसंगत।
4. राज्य को “तंत्र” के रूप में परिभाषित करने का प्रस्ताव
यह सुझाव रखा गया कि—
• राज्य को “तंत्र” कहा जाए।
• वर्तमान बालिग मताधिकार प्रणाली के माध्यम से जैसे लोकसभा का गठन होता है, उसी प्रकार तंत्र का ढाँचा बने।
• विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका बनी रहें, किंतु उनकी भूमिका—
o न्याय
o आंतरिक एवं बाह्य सुरक्षा
तक ही सीमित रहे।
5. संवैधानिक इकाई की संरचना
संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा हेतु एक अलग व्यवस्था का प्रस्ताव रखा गया, जिसकी संरचना निम्न प्रकार हो—
• व्यक्ति → परिवार
• परिवार → ग्राम सभा
• ग्राम सभा → जिला सभा
• जिला सभा → प्रदेश सभा
• प्रदेश सभा → राष्ट्रीय स्तर की सभा
यह संपूर्ण व्यवस्था संविधान द्वारा संचालित होगी।
संविधान का निर्माण जनमत संग्रह के माध्यम से किया जाएगा।
6. समाज की स्वतंत्र व्यवस्था
समाज की संरचना भी स्वतंत्र होगी—
• परिवार एक समाज
• गाँव एक समाज
• जिला एक समाज
• प्रदेश एक समाज
• राष्ट्र स्तर पर भी समाज
समाज जितने कार्य संविधान के माध्यम से संवैधानिक इकाई को सौंपेगा, वही कार्य उस सीमा तक किए जाएँगे।
7. “राष्ट्र” शब्द पर पुनर्विचार
विस्तृत चर्चा के बाद यह निष्कर्ष सामने आया कि—
• राष्ट्र, राज्य और देश—व्यवहार में लगभग एक ही अर्थ में प्रयुक्त होते हैं।
• राष्ट्र को एक स्वतंत्र प्रशासनिक इकाई के रूप में परिभाषित करना न तो उचित है और न ही संभव।
यह स्वीकार किया गया कि—
• समाज मूल इकाई है
• राज्य उसका प्रबंधक है
अतः यह सहमति बनी कि—
• संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए एक नई, पृथक इकाई बनाई जाए
• उसका नाम “राष्ट्र” हो, यह आवश्यक नहीं
• उसे संघ सरकार या कोई अन्य उपयुक्त नाम दिया जा सकता है
8. निष्कर्ष
इस प्रकार बैठक में यह सहमति बनी कि—
• “राष्ट्र” शब्द को वर्तमान अर्थ में प्रयोग करना भ्रम उत्पन्न करता है
• जनकल्याण और अधिकारों की रक्षा हेतु नई वैचारिक एवं संरचनात्मक व्यवस्था आवश्यक है
• राज्य, संवैधानिक इकाई और समाज—तीनों की भूमिका स्पष्ट, सीमित और पृथक होनी चाहिए
इस विषय पर विस्तृत और निर्णायक चर्चा फरवरी माह में रामानुजगंज में प्रस्तावित सम्मेलन में की जाएगी।