मैं भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में अपनी भूमिका स्पष्ट रखता हूँ।

मैं भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में अपनी भूमिका स्पष्ट रखता हूँ। जब दुनिया का प्रश्न आता है, तब मैं “जय जगत” के पक्ष में खड़ा रहता हूँ। मैं पूरी दुनिया के संविधान की बात करता हूँ, केवल राष्ट्रीय संविधान तक स्वयं को सीमित नहीं रखता। मैं संयुक्त राष्ट्र संघ का पक्षधर नहीं हूँ, बल्कि संयुक्त मानव संघ के विचार का समर्थन करता हूँ।
जब भारत की बात आती है, तब मैं भारत पर चर्चा करते समय हिंदी, हिंदू और हिंदुस्तान की बात करता हूँ। मैं अपने विचारों को केवल गाय, गंगा और मंदिर तक सीमित नहीं रखता। मैं एक विचारक हूँ, भावना-प्रधान व्यक्ति नहीं। मैं भावना-प्रधान लोगों का मार्गदर्शन करता हूँ, उनका शोषण नहीं।
गाय, गंगा और मंदिर की बात हिंदी, हिंदू और हिंदुस्तान के बाद आती है, पहले नहीं।
लेकिन जब परिवार की बात आती है, तब मैं सरकार की अपेक्षा परिवार व्यवस्था और ग्राम व्यवस्था को अधिक महत्व देता हूँ। यदि परिवार और गाँव शक्तिशाली हो जाएँ, तो हिंदी, हिंदू और हिंदुस्तान—तीनों स्वतः सुरक्षित हो जाएंगे।
यही कारण है कि मैं शंकराचार्य की तुलना में संघ को अधिक महत्व देता हूँ। वर्तमान सरकार और मोहन भागवत गांधी मार्ग पर चल रहे हैं, जिसे शंकराचार्य वर्ग ठीक से समझ ही नहीं पा रहा है। मेरे विचार में वर्तमान सरकार अपेक्षा से कई गुना बेहतर कार्य कर रही है, इसलिए हम आँख बंद करके इस सरकार का समर्थन कर रहे हैं।
हम परिवार और ग्राम-स्वराज को राष्ट्र-व्यवस्था की नींव मानते हैं और हिंदी, हिंदू और हिंदुस्तान को विश्व-व्यवस्था की नींव मानकर उन्हें सशक्त बनाए रखना चाहते हैं।