आदर्श लोकतंत्र की खोज: विधायिका और कार्यपालिका का वास्तविक विभाजन

2 अप्रैल प्रातःकालीन सत्र। वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में आदर्श लोकतंत्र वह माना जाता है, जिसमें विधायिका और कार्यपालिका अलग-अलग होते हैं। विधायिका कानून बनाने तक सीमित रहती है और कार्यपालिका उस कानून का स्वतंत्रता से क्रियान्वयन करती है। लेकिन वर्तमान भारतीय संविधान में विधायिका और कार्यपालिका लगभग एक हो गए हैं।

विधायिका के लोग ही मिलकर राष्ट्रपति का निर्वाचन करते हैं। विधायिका के लोग ही मिलकर प्रधानमंत्री की नियुक्ति करते हैं, मंत्रिमंडल बनाते हैं, और इस तरह मंत्रिमंडल और विधायिका एकजुट होकर अलग-अलग दिखने की खानापूर्ति करते हैं। वास्तव में वे अलग-अलग होते नहीं, क्योंकि राष्ट्रपति भी इन दोनों का गुलाम बन जाता है।

ऐसी स्थिति में हम आदर्श लोकतंत्र चाहते हैं। आदर्श लोकतंत्र में विधायिका और कार्यपालिका बिल्कुल अलग-अलग होंगे। राष्ट्रपति भी पूरी तरह स्वतंत्र होंगे, विधायिका और कार्यपालिका के गुलाम नहीं।

इसलिए हम एक नई व्यवस्था करने जा रहे हैं, जिसके अनुसार एक अलग से संविधान सभा होगी। संविधान सभा की भी राष्ट्रपति के निर्वाचन में अपनी भूमिका होगी। दूसरी बात यह कि राष्ट्रपति गुलाम नहीं, शक्तिसंपन्न होंगे। तीसरी बात यह कि विधायिका और कार्यपालिका दोनों का अस्तित्व अलग-अलग होगा। विधायिका के लोग ही कार्यपालिका में नहीं जाएंगे, बल्कि कार्यपालिका का चुनाव विधायिका करेगी, लेकिन कार्यपालिका के लोग विधायिका से अलग होंगे।

इस तरह वर्तमान लोकतंत्र का एक संशोधित स्वरूप मैंने आपके सामने रखा है। यद्यपि यह लोकस्वराज नहीं है, लेकिन विकृत लोकतंत्र का एक संशोधित स्वरूप है।